Sunday, April 21, 2024
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आज भी प्रासंगिक हैं बुद्ध

छठी शताब्दी ई.पू. भारत के लिए धाÌमक और आध्यात्मिक क्रान्ति का काल था। धाÌमक अंधविश्वास‚ बाह्याडंबर‚ महंगे कर्मकांड‚ कठोर जाति–व्यवस्था‚ जटिल अनुष्ठान और बलि–प्रथा से समाज त्राहि–त्राहि कर रहा था। हिन्दू–धर्म अनेक सामाजिक और धाÌमक बुराइयों का शिकार हो चुका था। ऐसी विषम परिस्थितियों में‚ हमारे आध्यात्मिक क्षितिज पर‚ भगवान विष्णु के ९वें अवतार माने जाने वाले महात्मा बुद्ध के रूप में एक ऐसे महान दार्शनिक और समाज सुधारक का उदय हुआ‚ जिन्होंने धर्म की सरल‚ व्यावहारिक और लोकोपयोगी व्याख्या की एवं बौद्ध–धर्म के रूप में एक धाÌमक दर्शन की स्थापना की जिसने आगे चलकर दुनिया को ‘मध्यम मार्ग’ के रूप में एक नवीन जीवन दर्शन दिया॥। प्रारंभिक जीवन और वैराग्यः राजपरिवार में जन्मे महात्मा बुद्ध का जन्म नेपाल की तराई में स्थित लुम्बिनी में ५६३वीं ईसा पूर्व में शाक्य–वंश (श्री राम के पुत्र ‘कुश‘ के वंश) के क्षत्रिय परिवार में हुआ था। बचपन का नाम ‘सिद्धार्थ‘ था और गोत्र था ‘गौतम’। अपने जीवन के पहले चरण में उन्होंने मानव जीवन के दुखों को देखा। इसके पश्चात वे २९ वर्ष की अवस्था में सांसारिक जीवन को त्याग कर सत्य की खोज में निकल पड़े। उन्होंने बोधगया में ‘आत्म–बोध’ प्राप्त किया और तदनन्तर ‘गौतम बुद्ध’ कहलाये। तब से लेकर ८० वर्ष की अवस्था में वर्तमान कुशीनगर में अपनी मृत्यु (महापरिनिर्वाण) तक‚ उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन यात्रा करते हुए लोगों को जीवन–चक्र से छुटकारा पाने की राह दिखाते हुए बिताया। उनकी मृत्यु के पश्चात उनके शिष्यों ने राजगीर में एक परिषद का आह्वान किया जहां बौद्ध–धर्म की मुख्य शिक्षाओं को संहिताबद्ध किया गया। चार बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया जिसके पश्चात तीन मुख्य पिटक बने। विनय पिटक (बौद्ध मतावलंबियों के लिए व्यवस्था के नियम)‚ सुत पिटक (बुद्ध के उपदेश सिद्धांत) तथा अभिधम्म पिटक (बौद्धदर्शन)‚ जिन्हें संयुक्त रूप से त्रिपिटक कहा जाता है। इन सब को पाली भाषा में लिखा गया है। राजा कनिष्क के शासन काल में बौद्ध–धर्म दो संप्रदायोंः हीनयान और महायान में बंट गया। बौद्ध–धर्म को आरंभिक रूप से प्रसारित करने का कार्य उनके अनुयायियों ने किया जिसे कई शासकों द्वारा प्रश्रय दिया गया॥। बौद्ध–धर्म के सिद्धांतः बौद्ध दर्शन का मूल सिद्धांत ‘आर्य–सत्य की संकल्पना’ है। इसे संस्कृत में ‘चत्वारि आर्यसत्यानि’ और पाली में ‘चत्तरि अरियसच्चानि’ कहते हैं। आर्य–सत्य चार हैंः॥ १. दुःखः संसार में दुःख है॥। २. समुदयः दुःख के कारण हैं॥। ३. निरोधः दुःख के निवारण हैं॥। ४. मार्गः निवारण के लिये अष्टांगिक मार्ग हैं॥। प्राणी जन्म भर विभिन्न दुःखों की श्रृंखला में पड़ा रहता है‚ यह दुःख आर्य सत्य है। संसार के विषयों के प्रति जो तृष्णा है वही समुदय आर्य सत्य है। जो प्राणी तृष्णा के साथ मरता है‚ वह उसकी प्रेरणा से फिर जन्म ग्रहण करता है। तृष्णा का अशेष परित्याग कर देना निरोध आर्य सत्य है। तृष्णा के न रहने से न तो संसार की वस्तुओं के कारण कोई दुःख होता है और न मरणोपरांत उसका पुनर्जन्म होता है। बुझ गए दीपक की तरह उसका निर्वाण हो जाता है। इस निरोध की प्राप्ति का मार्ग ‘अष्टांगिक मार्ग’ है। इसके आठ अंग हैं–सम्यक oष्टि‚ सम्यक संकल्प‚ सम्यक वचन‚ सम्यक कर्म‚ सम्यक आजीविका‚ सम्यक व्यायाम‚ सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि। इस आर्य–मार्ग को सिद्ध कर मनुष्य मुक्त हो जाता है॥। धर्म के पहले वैज्ञानिक बुद्धः गौतम बुद्ध ने जितने ¾दयों की वीणा को बजाया है‚ उतना किसी और ने नहीं। उनके माध्यम से जितने लोग जागे और जितने लोगों ने परम–भगवत्ता प्राप्त की है‚ उतनी किसी और के माध्यम से नहीं। बुद्ध ने ऐसा विश्लेषण किया जैसा न किसी ने किया था और न फिर दोबारा कोई कर पाया। बुद्ध यह नहीं कहते कि जो मैं कहता हूं‚ भरोसा कर लो। वे कहते हैं कि सोचो‚ विचारो‚ विश्लेषण करो‚ खोजो‚ पाओ अपने अनुभव से और फिर भरोसा करना। दुनिया के सारे धर्मों ने भरोसे को पहले रखा है‚ सिर्फ बौद्ध–धर्म को छोड़कर। दुनिया के सारे धर्मों में श्रद्धा प्राथमिक है। बुद्ध ने कहा‚ अनुभव प्राथमिक है‚ श्रद्धा आनुषंगिक है। अनुभव होगा‚ तो श्रद्धा होगी। अनुभव होगा‚ तो आस्था स्वयं आ जाएगी। ॥ बुद्ध की प्रासंगिकताः बुद्ध उच्च नैतिक मूल्यों के साथ एक श्रेष्ठ जीवन–पद्धति की वकालत करते हैं। वह अंतःशुद्धि पर बल देते हैं। उन्होंने ‘आत्म दीपो भव’ अर्थात ‘अपना दीपक स्वयं बनो’ पर जोर दिया। उनका ‘मध्यम मार्ग’ सिद्धांत आज भी उतना ही प्रासंगिक है। यह रूढ़िवादिता को नकारते हुए ताÌककता पर बल देता है। दरअसल आज दुनिया में तमाम तरह के झगड़े हैं जैसे– सांप्रदायिकता‚ आतंकवाद‚ नक्सलवाद‚ नस्लवाद तथा जातिवाद इत्यादि। इन सारे झगड़ों के मूल में बुनियादी समस्या यह है कि कोई भी व्यक्ति‚ देश या संस्था अपने oष्टिकोण से पीछे हटने को तैयार नहीं है। लेकिन ‘मध्यम मार्ग’ सिद्धांत को स्वीकार करते ही हमारा नैतिक oष्टिकोण बेहतर हो जाता है। हम यह मानने लगते हैं कि किसी भी चीज का अति होना घातक होता है। यह विचार हमें विभिन्न oष्टिकोणों के मेल–मिलाप तथा आम सहमति प्राप्त करने की ओर ले जाता है। ॥ बुद्ध का यह विचार कि दुखों का मूल कारण इच्छाएं हैं‚ आज के उपभोक्तावादी समाज के लिए प्रासंगिक प्रतीत होता है। दरअसल प्रत्येक इच्छा की संतुष्टि के लिए प्राकृतिक या सामाजिक संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे में अगर सभी व्यक्तियों के भीतर इच्छाओं की प्रबलता बढ़ जाए तो संसाधन नष्ट होने लगेंगे‚ साथ ही सामाजिक संबंधों में तनाव उत्पन्न हो जाएगा। ऐसे में अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करना समाज और नैतिकता के लिए अनिवार्य हो जाता है। वे ऐसे गुुणों के विकास पर बल देते हैं जिनसे ‘शांतिपूर्ण–सह–अस्तित्व‘ जैसे आदर्श समाज में स्थापित हो सकें। उनका ‘कर्मवादी सिद्धांत‘ भी वर्तमान विश्व को मानव कल्याण से जोड़कर समाज को ताÌकक बनाने में कारगर साबित होता है। उनकी शिक्षाओं की उपयोगिता आज के परिप्रेIय में और बढ़ जाती है जिसके माध्यम से शांति और सतत विकास पर आधारित एक संघर्ष–मुक्त विश्व–व्यवस्था को सुनिश्चित किया जा सकता है। आज विचारधाराओं के समर्थकों को विचारहीन मृत्यु और विनाश से बचने के लिए रचनात्मक रूप से संलग्न होने की आवश्यकता है। ऐसे में बुद्ध का सिद्धांत ‘शांति से बढ़कर कोई आनंद नहीं है’ ज्यादा प्रासंगिक हो जाता है। उनका ‘अहिंसा का सिद्धांत’ सभी जीवों और प्राकृतिक संतुलन के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। ‘अष्टांगिक मार्ग’ तो आज के भौतिकवादी समाज में और ज्यादा प्रासंगिक हो जाता है। उदाहरण के लिए उनका ‘सम्यक आजीविका’ का विचार इस बात पर बल देता है कि समाज में सभी को आजीविका मिले जिससे बेरोजगारी और वर्ग–संघर्ष न हो॥। बुद्ध को अपना आध्यात्मिक संदेश देना था। उनका लIय ‘ब्राह्मणवाद के विरु द्ध विद्रोह’ नहीं था। वे सदैव हिन्दू रहे। उनका ‘अष्टांगिक मार्ग’ महÌष पतंजलि के ‘अष्टांग योग’ से मिलता है जो वेद की योग विद्या पर आधारित है। उन्होंने वस्तुतः चिंतन‚ शिक्षा और लोकाचार किसी में कोई ऐसी नई शुरु आत नहीं की जिसे पूर्ववर्ती ज्ञान‚ परंपरा या धर्म का प्रतिरोधी कहा जाय। बुद्ध का लIय वैज्ञानिकता लाकर उपनिषदों के आदर्शवाद को उसके सर्वोत्तम रूप में आत्मसात करना था और इसे मानवता की दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अनुकूल बनाना था। ऐसा ही हुआ और आज बौद्ध–धर्म श्रीलंका‚ म्यांमार‚ लाओस‚ कम्बोडिया‚ थाईलैंड और चीन का प्रमुख धर्म है। निश्चय ही‚ आज की विषम आंतरिक व बाह्य परिस्थितियों में बुद्ध और प्रासंगिक बन गये हैं॥। (लेखक भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हैं)॥

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