Saturday, April 20, 2024
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सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act)

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) जिसे ‘आरटीआई एक्ट’ के नाम से जाना जाता है। यह अधिनियम भारतीय लोकतंत्र को सशक्त करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रखता है। समय के साथ संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का विस्तार होता चला गया। एक समय वह भी आया जब सूचना के अधिकार को एक मौलिक अधिकार माना गया। जानने का अधिकार किसी भी व्यक्ति का मानव अधिकार है तथा भारत के संविधान में उल्लेखित किए गए मौलिक अधिकारों में एक मौलिक अधिकार भी है जिसे अनुच्छेद 19 का हिस्सा बनाया गया है। Also Read – सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) भाग: 2 अधिनियम के अंतर्गत परिभाषाएं यह अधिकार केवल एक मौलिक अधिकार बन कर न रह जाए तथा एक स्वर्णिम उद्घोषणा मात्र बनकर न रह जाए इस उद्देश्य से इस विचार को तथा इस अधिकार को व्यवहार में लाने के उद्देश्य से सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 भारत की संसद द्वारा गढ़ा गया है। भ्रष्टाचार भारत की एक प्रमुख समस्या रही है सर्वजनिक विभागों में भ्रष्टाचार से संबंधित मामले आए दिन देखने को मिलते हैं। अनेक विधान भ्रष्टाचार रोधी भारत में बनाए गए। यह अधिनियम उन विधानों की ही एक कड़ी है। इस अधिनियम के माध्यम से भ्रष्टाचार की समस्या पर विजय पाने का एक प्रयास किया गया है। Also Read – अनुसूचित जनजातियों की सूची: जानिए कौन सी जातियों को अनुसूचित जनजातियों का दर्जा प्राप्त है यह अधिनियम भारत के प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार प्रदान करता है कि वह कोई भी सार्वजनिक जानकारी जो उसके हितार्थ हो या न हो भारत सरकार के अधिकारियों से प्राप्त कर सकता है। इस अधिनियम को व्यवहार में लाने के लिए इसके अंतर्गत संपूर्ण व्यवस्था की गई है। एक प्राधिकरण का निर्माण किया गया है जो इस अधिनियम के अंतर्गत सूचना प्रदान करता है। सूचना नहीं दिए जाने पर अपील की व्यवस्था की गई है तथा वहां सूचना नहीं देने के परिणामस्वरूप दोषियों को शास्ति (सज़ा) दिए जाने का भी प्रावधान किया गया है। इस अधिनियम के अंतर्गत कुछ ऐसी बातें जिन्हें सार्वजनिक किया जाना किसी मामले या देश हित में नहीं है उन्हें छूट दी गई है तथा जनता उन मामलों की जानकारी प्राप्त नहीं कर सकती है। Also Read – जानिए सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 के दाण्डिक प्रावधान इस आलेख के अंतर्गत सूचना के अधिकार अधिनियम का एक सारगर्भित परिचय प्रस्तुत किया जा रहा है। इसके बाद अगले आलेखों में इस अधिनियम से संबंधित सभी महत्वपूर्ण धाराओं पर न्यायालय के दिए हुए न्याय निर्णयों के साथ टीका प्रस्तुत किया जाएगा। सूचना का अधिकार:- सूचना के अधिकार के लिये समुचित विधायन के लिये संघर्ष दो मुख्य आधारों पर किया गया। प्रथम कठोर उपनिवेशी शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 के लिये संशोधन की मांग और दूसरा सूचना के अधिकार पर प्रभावी विधि के लिये आन्दोलन है। शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 पूर्व ब्रिटिश शासकीय गुप्त बात अधिनियम की प्रतिकृति है और जासूसी के सम्बन्ध में प्रावधान करती है। Also Read – अनुसूचित जनजातियों को प्राप्त वन अधिकार के बारे में जानिए पिछले दशक के दौरान, नागरिकों के समूह द्वारा केन्द्र शासकीय गुप्त बात अधिनियम में केवल संशोधन की मांग उसके पूर्ण निरसन और व्यापक विधायन द्वारा उसके प्रतिस्थापन के लिये मांग में परिवर्तित हो गया था, जो कर्तव्य और अपराध की गोपनीयता को प्रकट करे। इसने नागरिक समूहों को प्रतीत कराया था कि कितना महत्वपूर्ण यह है कि सूचना के लोगों के अधिकार को विधि द्वारा और सूचना का अधिकार प्रवर्तित किया जाना चाहिए। संविधान के अंतर्गत सूचना का अधिकार:- भारत में स्वतन्त्रता की प्राप्ति के पश्चात्, लिखित संविधान के साथ उदार लोकतान्त्रिक राजनैतिक प्रणाली विधि का शासन, सामाजिक न्याय विकास, वयस्क मतदान समय से निर्वाचन, बहुदलीय प्रणाली, अस्तित्व में आया है। लोकतांत्रिक राजनैतिक प्रणाली के पारदर्शी कार्य के लिये, संविधान के निर्माताओं ने संविधान के भाग-3 में मूल अधिकार में अभिव्यक्ति के अधिकार के प्रावधान को शामिल किया था। भारतीय संविधान में सूचना का कोई विनिर्दिष्ट अधिकार या प्रेस की स्वतन्त्रता का कोई अधिकार नहीं है जबकि सूचना के अधिकार को संवैधानिक प्रत्याभूति के रूप में पढ़ा गया है, जो मूल अधिकार पर अध्याय का भाग है। भारतीय संविधान में मूल और असंक्रमणीय अधिकारों की प्रभावी श्रृंखला है, जो संविधान के अध्याय-3 में अन्तर्विष्ट है। इनमें विधियों के समान संरक्षण का अधिकार और विधि के समक्ष समता का अधिकार (अनुच्छेद 14) वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अधिकार [अनुच्छेद 19 (1) (क)] और प्राण तथा दैहिक स्वतन्त्रता का अधिकार (अनुच्छेद 21) शामिल है। अनुच्छेद 32 में संवैधनिक उपचारों का अधिकार इन्हें आधार प्रदान करता है अर्थात् इन अधिकारों में से किसी के उल्लंघन के मामले में उच्चतम न्यायालय के समक्ष आवेदन करने का अधिकार है। इन अधिकारों का उच्चतम न्यायालय द्वारा विगत वर्षों में गतिशील निवंचन किया गया है और इसे वास्तव में भारत में विधि के शासन के विकास के लिये अधिकार होना कहा जा सकता है। सूचना के अधिकार के सम्बन्ध में विधिक स्थिति का विकास उक्त सभी अधिकारों के सन्दर्भ में दिये गये उच्चतम न्यायालय के कई विनिधयों के माध्यम से किया गया है किन्तु अधिक विनिर्दिष्ट रूप से वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के संबंध में, जिसे जानने के अधिकार का प्रतिकूल पहलू होना कहा गया है और एक का अन्य के बिना प्रयोग नहीं किया जा सकता। इन न्यायिक घोषणाओं का रुचिकर पहलू यह है कि अधिकार के क्षेत्र का धीरे-धीरे राजव्यवस्था में और समाज में सांस्कृतिक परिवर्तन को ध्यान में रखकर व्यापक बनाया गया है। देश की संवैधानिक विधि के भाग के रूप में सूचना के अधिकार का विकास या एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अधिकार के कतिपय तार्किक विवक्षा के प्रवर्तन के लिये जैसे समाचार पत्रों के वितरण पर प्रतिबन्ध के नियन्त्रण के लिये सरकारी आदेशों को चुनौती देने के साथ प्रारम्भ हुआ था। इन्हीं मामलों के माध्यम से लोगों की जानने के अधिकार की अवधारणा का विकास किया गया था। उच्चतम न्यायालय और सूचना का अधिकार:- दो दशकों के अधिक से उच्चतम न्यायालय ने संवैधानिक रूप से संरक्षित मूल अधिकार के रूप में सूचना के अधिकार को मान्यता दी है, जो संविधान के अनुच्छेद 19 (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (प्राण का अधिकार) के अधीन स्थापित है। न्यायालय ने मान्यता दी है कि सरकारी विभागों से सूचना प्राप्त करने का अधिकार लोकतन्त्र के लिये मूल है। उच्चतम न्यायालय ने संगत रूप से नागरिकों के जानने के अधिकार के पक्ष में विनिश्चय किया है। बेनेट कोलमैन बनाम भारत संघ, एआईआर 1973 में सूचना के अधिकार को अनुच्छेद 19 (1) (क) द्वारा प्रत्याभूत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के अधिकार के अन्तर्गत शामिल किया जाना निर्णीत किया गया था। उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राज नारायण, एआईआर 1975 एस सी 865 : (1975) में न्यायमूर्ति के के मैथ्यू ने स्पष्ट रूप अधिकथित किया था कि सामान्य नैमित्तिक कारबार को गोपनीयता के आवरण से आच्छादित करना सामान्य जनता के हित में नहीं है। अधिकारियों का अपने कार्यों को स्पष्ट करने और न्यायोचित ठहराने का उत्तरदायित्व दमन और भ्रष्टाचार के विरुद्ध मुख्य संरक्षण है। यह और अवधारित किया गया था कि सरकार में जहां सामान्य जनता के सभी अभिकर्ताओं को उनके आचरण के लिये उत्तरदायी होना चाहिये, वहां कुछ गोपनीयता हो सकती है। लोगों को प्रत्येक सार्वजनिक कार्य, प्रत्येक चीज को जानने का अधिकार है, जिसे सार्वजनिक ढंग में उनके सार्वजनिक कर्मचारियों द्वारा किया जाता है। पुन: उच्चतम न्यायालय ने सचित, सूचना एवं प्रसारण मन्त्रालय, भारत सरकार बनाम बंगाल क्रिकेट संघ में अवधारित किया था कि इलेक्ट्रॉनिक समाचार माध्यम से सूचना प्रदान करने और प्राप्त करने के अधिकार को वाक की स्वतन्त्रता में शामिल किया गया है। एस पी गुप्ता बनाम भारत संप में प्रत्येक सार्वजनिक कार्य और सार्वजनिक कर्मचारियों द्वारा किये गये संव्यवहार के विवरण को जानने का अधिकार वर्णित किया गया था। पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टी बनाम भारत संप, एआईआर 2004 एससीसी 476 में सूचना के अधिकार को मानवीय अधिकार की प्रास्थिति पर पुनः विस्तारित किया गया था, जो शासन को पारदर्शी तथा उत्तरदायी बनाने के लिये आवश्यक है। इस पर भी बल दिया गया था कि शासन में भागीदारी होनी चाहिए। सार्वजनिक सुनवायी भारत में सूचना अधिकार के आन्दोलन के लिये मूल बिन्दु है। सार्वजनिक सुनवायी का हथियार एम के एस एस द्वारा राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों के उस भागों में प्रारम्भ किया गया था। लोगों की संलग्नता के साथ भ्रष्टाचार को रोकने के लिये सार्वजनिक सुनवायी प्रारम्भ की गयी थी। सार्वजनिक सुनवायी सार्वजनिक विवादों के बारे में खुले और लोकतान्त्रिक विवाद के अतिरिक्त कुछ नहीं है। सार्वजनिक सुनवायी के इस प्रकार में निर्वाचित प्रतिनिधि, सरकारी अधिकारी, जनता, स्थानीय बुद्धिजीवी वर्ग तथा अभिवक्ता, संवाददाता, गैर सरकारी संगठन, समुदाय आधारित संगठन, बाह्य सम्परीक्षक इत्यादि भागीदारी करेंगे। सार्वजनिक सुनवायी में साधारणतया विवादों की शिनाख्त करने के पश्चात् उदाहरण के लिये विकास क्रियाकलापों में भ्रष्टाचार की शिनाख्त करने के बाद पुनः विचार-विमर्श होता है। मजदूर किसान शक्ति संगठन में सूखा राहत कार्यों में, जो ग्रामीण निर्धन के लिये स्वीकृत किये गये थे, भ्रष्टाचार, दुरूपयोग और भाई-भतीजावाद की शिनाख्त की थी। इसलिये एम के एस एस ने समाज के वर्ग को शामिल करके अकिड़ा और दस्तावेजों के सारभूत साक्ष्य के साथ ग्रामीण विकास क्रियाकलापों पर जन सुनवायी की श्रृंखला को प्रारम्भ किया था। जन सुनवायी का संचालन पंचायत राज संस्थानों, सरकारी कार्यालयों और गैर-सरकारी संगठनों में संचालित किया गया था, जो लोक प्राधिकारियों से सारभूत वित्तीय सहायता प्राप्त कर रहे हैं। सामान्य जनता के समक्ष इन सार्वजनिक सुनवाइयों में यह साबित किया जाता है कि अत्यधिक भ्रष्टाचार और दुरूपयोग हो रहा है। यह अभिलेखों और रजिस्टरों के रखरखाव की गोपनीयता और नागरिकों के लिये सार्वजनिक सूचना में पहुंच की कमी के कारण हुआ था। इसलिये, राज्य सरकार या केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रारम्भ किये गये विकास क्रियाकलापों में भ्रष्टाचार से लड़ने के लिये सार्वजनिक सूचना तक पहुँच होने के लिये अधिनियम को धारण करने की आवश्यकता है। सार्वजनिक सुनवाई के साथ एम के एस एस ने राजस्थान के विभिन्न भागों में सूचना के अधिकार के लिये प्रत्यक्ष कार्यवाही जैसे धरना को भी प्रारम्भ किया। मांग स्थानीय विकास व्यय से सम्बन्धित सामान्य नागरिकों के सूचना के अधिकार को प्रवर्तित करने के लिये प्रशासनिक आदेशों को जारी करने के लिये बल देना था। लेकिन सरकार से कोई आश्वासन नहीं दिया गया था और यह जयपुर तक फैल गया था। जयपुर में 70 से अधिक जनसंगठन और कई सम्मानित नागरिक एम के एस एस की मांग का समर्थन करने के लिये आये थे। परिणामस्वरूप राज्य में सूचना का अधिकार अधिनियम को अधिनियमित किया गया था। राज्य सरकारों में से कुछ ने जैसे गोवा (1997), तमिलनाडु, (1997), राजस्थान (2000), कर्नाटक (2000), दिल्ली (2001), असम (2002), महाराष्ट्र (2003), मध्य प्रदेश (2003) और जम्मू तथा कश्मीर (2003) सूचना का अधिकार अधिनियम को अधिनियमित किया था।

राष्ट्रीय सूचना का अधिकार अधिनियम के लिए संघर्ष:- राष्ट्रीय सूचना का अधिकार के पुरःस्थापन के लिये वर्ष 1996 के बाद से प्रारम्भ किया गया है। लोगों के सूचना के अधिकार के लिये राष्ट्रीय आन्दोलन की स्थापना वर्ष 1996 में की गयी थी। इसके संस्थापक सदस्यों में सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, अधिवक्ता, व्यावसायिक, सेवानिवृत्त सिविल सेवक और शिक्षाशास्त्री शामिल थे और इसके प्रारम्भिक उद्देश्य में से एक सूचना के मूल अधिकार के प्रयोग को सुकर बनाने के लिये राष्ट्रीय विधि के अधीन आन्दोलन था साधारण जन आन्दोलन, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों को दबाव के उत्तर में भारतीय प्रेस कौन्सिल ने मॉडल विधेयक प्ररूपित किया था, जिसे बाद में राष्ट्रीय ग्रामीण विकास संस्थान द्वारा आयोजित कार्यशाला में अद्यतन किया गया था और भारत सरकार को भेजा गया था, जो भारत सरकार द्वारा तैयार किये गये प्रथम प्रारूप विधेयक के लिये निर्देश कागजात में से एक के रूप में था। कुछ राजनैतिक और अन्य कारणों से विधेयक को संसद द्वारा ग्रहण नहीं किया गया था। लेकिन बाद में संसद ने स्वातन्त्र्य सूचना अधिनियम, 2002 अधिनियमित किया था, जिसे सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था। TAGS

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) के अंतर्गत धारा- 2 में इस अधिनियम से संबंधित महत्वपूर्ण शब्दों की परिभाषा प्रस्तुत की गई है। इन परिभाषाओं के माध्यम से इस अधिनियम के प्रावधानों को समझा जाता है और उनका ठीक निर्वचन किया जाता है।

जैसा कि किसी भी अधिनियम के प्रारंभ में उसके विस्तार और उसके नाम के बाद उस अधिनियम से संबंधित विशेष शब्दों की परिभाषा ठीक अगली धारा में प्रस्तुत की जाती है इसी प्रकार इस अधिनियम में भी किया गया है।

इस आलेख के अंतर्गत धारा 2 पर टीका प्रस्तुत किया जा रहा है और परिभाषा से संबंधित अदालतों के दिए न्याय निर्णय भी प्रस्तुत किए जा रहे हैं जोकि अधिनियम सेे संबंधित आधारभूत सिद्धांत भी प्रतिपादित करते हैं।

इस आलेख के अंतर्गत अधिनियम में प्रस्तुत की गई धारा 2 के मूल स्वरूप को प्रस्तुत किया जा रहा है जो इस प्रकार है:-

धारा- 2

परिभाषाएं:-)

इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,

(क) “समुचित सरकार” से किसी ऐसे लोक प्राधिकरण के संबंध में जो-

(i) केन्द्रीय सरकार या संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन द्वारा स्थापित, गठित, उसके स्वामित्वाधीन, नियंत्रणाधीन या उसके द्वारा प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध कराई गई निधियों द्वारा पूर्णतया वित्तपोषित किया जाता है, केन्द्रीय सरकार अभिप्रेत है।

(ii) राज्य सरकार द्वारा स्थापित, गठित उसके स्वामित्वाधीन, नियंत्रणाधीन या उसके द्वारा प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध कराई गई निधियों द्वारा सारभूत रूप से वित्तपोषित किया जाता है, राज्य सरकार अभिप्रेत है।

(ख) “केन्द्रीय सूचना आयोग” से धारा 12 की उपधारा (1) के अधीन गठित केन्द्रीय सूचना आयोग अभिप्रेत है।

(ग) ‘केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी” से उपधारा (1) के अधीन पदाभिहित केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन इस प्रकार पदाभिहित कोई केन्द्रीय सहायक लोक सूचना अधिकारी भी है।

(घ) “मुख्य सूचना आयुक्त” और “सूचना आयुक्त” से धारा 12 की उपधारा (3) के अधीन नियुक्त मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त अभिप्रेत है; (ङ) “सक्षम प्राधिकारी” से अभिप्रेत है।

(i) लोक सभा या किसी राज्य की विधान सभा की या किसी ऐसे संघ राज्यक्षेत्र की, जिसमें ऐसी सभा है, दशा में अध्यक्ष और राज्य सभा या किसी राज्य को विधान परिषद की दशा में सभापति।

(ii) उच्चतम न्यायालय की दशा में भारत का मुख्य न्यायमूर्ति।

(iii) किसी उच्च न्यायालय की दशा में उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति।

(iv) संविधान द्वारा या उसके अधीन स्थापित या गठित अन्य प्राधिकरणों की दशा में, यथास्थिति, राष्ट्रपति या राज्यपाल।

(v) संविधान के अनुच्छेद 239 के अधीन नियुक्त प्रशासक।

(च) “सूचना” से किसी इलेक्ट्रानिक रूप में धारित अभिलेख, दस्तावेज, ज्ञापन, ई मेल, मत, सलाह, प्रेस विज्ञप्ति, परिपत्र, आदेश, लागबुक, संविदा, रिपोर्ट, कागजपत्र, नमूने, माडल, आंकड़ों संबंधी सामग्री और किसी प्राइवेट निकाय से संबंधित ऐसी सूचना सहित, जिस तक तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किसी लोक प्राधिकारी की पहुंच हो सकती है, किसी रूप में कोई सामग्री, अभिप्रेत है।

(छ) “विहित” से, यथास्थिति, समुचित सरकार या सक्षम प्राधिकारी द्वारा अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है।

(ज) “लोक प्राधिकारी” से

(क) संविधान द्वारा या उसके अधीन

(ख) संसद द्वारा बनाई गई किसी अन्य विधि द्वारा

(ग) राज्य विधान मंडल द्वारा बनाई गई किसी अन्य विधि द्वारा

(घ) समुचित सरकार द्वारा जारी की गई अधिसूचना या किए गए आदेश द्वारा, स्थापित या गठित कोई प्राधिकारी या निकाय या स्वायत्त सरकारी संस्था अभिप्रेत है, और इसके अन्तर्गत, –

(i) कोई ऐसा निकाय है जो केन्द्रीय सरकार के स्वामित्वाधीन, नियंत्रणाधीन या उसके द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध कराई गई निधियों द्वारा सारभूत रूप से वित्तपोषित है।

(ii) कोई ऐसा गैर-सरकारी संगठन है जो समुचित सरकार, द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध कराई गई निधियों द्वारा सारभूत रूप से वित्तपोषित है।

(झ) “अभिलेख” में निम्नलिखित सम्मिलित हैं-

(क) कोई दस्तावेज, पाण्डुलिपि और फाइल।

(ख) किसी दस्तावेज की कोई माइक्रोफिल्म, माइक्रोफिशे और प्रतिकृति प्रति।

(ग) ऐसी माइक्रोफिल्म में सन्निविष्ट प्रतिबिम्ब या प्रतिबिम्बों का पुनरुत्पादन (चाहे वर्द्धित रूप में हो या न हो); और

(घ) किसी कम्प्यूटर द्वारा या किसी अन्य युक्ति द्वारा उत्पादित कोई अन्य सामग्री;

(ञ) “सूचना का अधिकार” से इस अधिनियम के अधीन पहुंच योग्य सूचना का, जो किसी लोक प्राधिकारी द्वारा या उसके नियंत्रणाधीन धारित है, अधिकार अभिप्रेत है और जिसमें निम्नलिखित का अधिकार सम्मिलित है-

(i) कृति, दस्तावेजों, अभिलेखों का निरीक्षण।

(ii) दस्तावेजों या अभिलेखों के टिप्पण, उद्धरण या प्रमाणित प्रतिलिपि लेना।

(iii) सामग्री के प्रमाणित नमूने लेना।

(iv) डिस्केट, फ्लापी, टेप, वीडियो कैसेट के रूप में या किसी अन्य इलेक्ट्रानिक रीति में या प्रिंटआउट के माध्यम से सूचना को, जहाँ ऐसी सूचना किसी कम्प्यूटर या किसी अन्य युक्ति में भण्डारित है, अभिप्राप्त करना।

(ट) “राज्य सूचना आयोग” से धारा 15 की उपधारा

(1) के अधीन गठित राज्य सूचना आयोग अभिप्रेत है;

(ठ) “राज्य मुख्य सूचना आयुक्त” और “राज्य सूचना आयुक्त” से धारा 15 की उपधारा (3) के अधीन नियुक्त राज्य मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त अभिप्रेत है;

(ड) “राज्य लोक सूचना अधिकारी” से उपधारा (1) के अधीन पदाभिहित राज्य लोक सूचना अधिकारी अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन उस रूप में पदाभिहित राज्य सहायक लोक सूचना अधिकारी भी है।

(ढ) “पर व्यक्ति” से सूचना के लिए अनुरोध करने वाले नागरिक से भिन्न कोई व्यक्ति अभिप्रेत है, और इसके अंतर्गत कोई लोक प्राधिकारी भी है।

यह इस अधिनियम से संबंधित धारा 2 का मूल स्वरूप था। यह धारा अधिनियम में प्रयुक्त महत्वपूर्ण शब्दों की विधिक परिभाषा देती है। इस प्रावधान में, कई परिभाषाएं दी गयी हैं, जो अधिनियम को समझने के लिए व्यापक महत्व की हैं।

नागरिक सूचना की ईप्सा- धारा 2 (च), 2 (झ), 2 (ञ) के अनुसार नागरिकों को उस सूचना की ईप्सा करने का अधिकार है, जो लोक प्राधिकारी के पास तात्विक प्ररूप में उपलब्ध है, जिसने सूचना की ईप्सा करने के वेश में स्पष्टीकरण की उनके ईप्सा करने के लिए कोई प्रावधान नहीं छोड़ा है।

लोक प्राधिकारी:-

लोक प्राधिकारी से कोई प्राधिकारी या स्वशासन का निकाय या संस्थान अभिप्रेत है, जो संविधान द्वारा या के अधीन

(क) संसद या राज्य विधान मण्डल द्वारा निर्मित किसी अन्य विधि द्वाराः

(ख) समुचित र द्वारा जारी की गई अधिसूचना या किये गये आदेश द्वारा स्थापित है या गठित है,

(ग) जो सरकार के स्वामित्वाधीन, नियंत्रणाधीन या सारभूत रूप से वित्तपोषित किसी निकाय को शामिल करता है; तथा

(घ) जो किसी गैर-सरकारी संगठन को शामिल करता है, जो सारभूत रूप से प्रत्यक्षतः या परोक्ष रूप से समुचित सरकार द्वारा वित्तपोषित है।

शब्द “और कोई शामिल है” खण्ड (घ) के भाग नहीं हैं, परन्तु धारा 2 (ज) के खण्ड (घ) के पृथक् स्वतंत्र रूप में और परे रखे गये हैं। शब्दों को संयुक्त रूप से नहीं पढ़ा जा सकता है। धारा 2 (ज) के खण्ड (क) से खण्ड (घ) में विहित किसी भी रीति से कोई प्राधिकारी या निकाय या संस्थान स्वायत्त सरकार मे पुनः समुचित सरकार द्वारा या तो स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन या सारवान् रूप से वित्तपोषित होना।

लोक प्राधिकारी नहीं:-

किसी और चीज जैसे स्वामित्व और सारभूत वित्त के बिना राज्य की अनुमति से स्थापित विद्यालय लोक प्राधिकारी नहीं है.- रीड लबान कॉलेज सोसाइटी बनाम स्टेट ऑफ मेघालय, ए० आई० आर० 2010 के मामले में कहा गया है।

न्यास और विद्यालय, जो प्रत्यक्षतः या परोक्ष रूप से समुचित सरकार द्वारा सारभूत रूप से वित्तपोषित नहीं है, लोक प्राधिकारी नहीं है।

सूचना की अवधारणा:-

अधिनियम में सूचना की अवधारणा ऐसी सूचना को प्रतिबन्धित नहीं कर सकती जो संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) के अधीन दर्शित मूल अधिकार के रूप में उपबन्धित होगा।

सूचना का अधिकार

इस अधिनियम के अधीन नागरिक को सूचना का अधिकार दिया गया है, जिसका तात्पर्य सभी लोक प्राधिकारियों से सूचना प्राप्त करने का अधिकार है। सूचना के अधिकार को व्यापक रूप से परिभाषित किया गया है, इसमें कार्यों, दस्तावेजों और अभिलेखों का निरीक्षण करने और दस्तावेजों/अभिलेखों/नमूनों का टिप्पण, उद्धरण या प्रमाणित प्रतियाँ लेने तथा मुद्रित या इलेक्ट्रानिक प्ररूप में सूचना, उदाहरणार्थ प्रिंट आउट, डिस्केट, फ्लापो, टेप इत्यादि अभिप्राप्त करने का अधिकार शामिल है।

लेकिन, दो शर्तें नागरिक द्वारा अधिनियम के अधीन कोई अधिसूचना अधिप्राप्त करने के लिए पूरी को जानी चाहिए:-

प्रथमतः सूचना लोक प्राधिकारी द्वारा धारण की जानी चाहिए या लोक प्राधिकारी के नियन्त्रण के अधीन होनी चाहिए और द्वितीयतः सूचना अधिनियम के अनुसार प्रकटन से मुक्त नहीं होनी चाहिए। कोई नागरिक अधिनियम के अधीन लिखित में अनुरोध करके इस अधिकार का प्रयोग कर सकता है। सूचना को इस आधार पर इन्कार नहीं किया जा सकता है कि यह लोक प्राधिकारी की पहुँच में नहीं है।

न्यायाधीशों द्वारा टिप्पणी या संकेत टिप्पणी या उनके प्ररूप निर्णय को लोक प्राधिकारी द्वारा धारण की गयी सूचना होना नहीं कहा जा सकता। यह बात सेक्रेटरी जनरल, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इण्डिया बनाम सुभाष चन्द्र अग्रवाल, ए आई आर 2010 के मामले में कही गई है।

सूचना के अधिकार के अधीन प्रमाणित प्रति प्राप्त करने का अधिकार आता है।

सूचना का अर्थ:-

सूचना से कोई सामग्री अभिप्रेत है, जो लोक प्राधिकारी द्वारा अभिलेखों, दस्तावेजों ज्ञापनों, ई-मेल, रायों, सलाहों, समाचार विज्ञप्ति, परिपत्रों, आदेशों, कार्य पंजियों, संविदाओं, रिपोर्टों, कागजातों, नमूनों, प्रदर्शों के इलेक्ट्रानिक प्ररूप में आंकड़े के रूप में धारित है। अभिलेख सूचना के महत्वपूर्ण संघटकों में से एक हैं और इसमें शामिल हैं:-

(क) कोई दस्तावेज, पाण्डुलिपि या फाइल

(ख) दस्तावेज की कोई लघु फिल्म या फोटो प्रति (ग) लघु फिल्म में अन्तर्विष्ट प्रतिबिम्ब को कोई प्रति; तथा

(घ) कम्प्यूटर या किसी अन्य युक्ति द्वारा उत्पादित कोई अन्य सामग्री।

शब्द ‘सूचना’ अत्यधिक व्यापक है क्योंकि यह अभिलेखों, दस्तावेजों, ज्ञापनों, ई-मेलों, रायों, सलाहों, प्रकाशनार्थ विज्ञप्तियों, परिपत्रों, आदेशों इत्यादि को शामिल करता है। यह तथ्य यूनियन ऑफ इण्डिया बनाम आर० एस० खान 2011 के मामले में प्रस्तुत किए गए हैं।

पर-पक्षकार का अर्थ:-

जब व्यक्ति किसी अन्य के लिए सूचना को एकत्रित करने के लिए अनुरोध करता है, जो लोक प्राधिकारी द्वारा धारित है, तो यह कहा जाता है कि आवेदन पर पक्षकार को अन्तर्ग्रस्त करता है।

इस पद में न केवल लोक प्राधिकारी वरन् वैयक्तिक निकाय या नागरिक से भिन्न व्यक्ति भी शामिल हैं।

पर पक्षकार को सूचना का प्रकटन:-

सहकारी समिति के ग्राहकों के सम्बन्ध में सूचना को सासोइटी द्वारा प्राप्त किया जा सकता है तथा अनुरक्षित नहीं किया जाता है। अतः पर-पक्षकार से सम्बन्धित सूचना को धारा 11 के अधीन प्रक्रिया का अनुसरण करने के पश्चात् प्राप्त किया जा सकता है।

मूल्यांकित उत्तर पुस्तिकायें संविधि के अनुसार सूचना होगी क्योंकि यह धारा 2 (च) के अन्तर्गत परीक्षक की राय को समाहित करते हुए अभिलेख का दस्तावेज हो जाती है। दिनेश सिन्हा बनाम भारतीय विद्यालय प्रमाण-पत्र परीक्षाओं का परिषद के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया है।

सांवलियाजी मंदिर मण्डल, राजस्थान बनाम मुख्य सूचना आयुक्त, राजस्थान, जयपुर, ए आई आर 2016 के वाद में न्यास की परिषदीय बैठक की प्रक्रिया तथा बैठक की कार्यसूची की सूचना की मांग की गयी थी। राज्य अधिनियम के अधीन न्यास का गठन किया गया था, जो कि “लोक प्राधिकारी” की परिभाषा के अन्तर्गत आता है। इस प्रकार ईप्सित सूचना धारा 8 के अन्तर्गत उल्लिखित किसी भी अपवाद खण्ड के अन्तर्गत नहीं आती। न्यास आवेदक को सूचना प्रकट करने के लिए दायी माना गया।

सूचना का अधिकार आवेदन फार्म | RTI Application Form

admin

Up Secondary Education Employee ,Who is working to permotion of education

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