Sunday, April 21, 2024
Secondary Education

विनियमितिकरण की सभी शर्तो को पूर्ण न करने के कारण विनियमितिकरण रद्द

‘प्रकाशन के लिए स्वीकृत’
निर्णय सुरक्षित करने की तिथि-29.11.2019 निर्णय सुनाने की तिथि- 10.01.2020
वाद: रिट – ‘ए’ संख्या. – 11764/2017
प्रार्थी: dkes’oj प्रसाद पांडेय
प्रत्यर्थी: उ0प्र0 राज्य एवं 4 अन्य
याची की ओर से अधिवक्ता: राम कृष्णा
प्रत्यर्थी की ओर से अधिवक्ता: मुख्य स्थायी अधिवक्ता, डी.के. ओझा
माननीय सौरभ श्याम शमशेरी, न्यायमूर्ति
1. प्रस्तुत प्रकरण के प्रमुख तथ्य निम्न है:-
2. सर्वोदय शिक्षा सदन इण्टर कालेज मीरपुर, इलाहाबाद एक मान्यता प्राप्त एवं सहायता प्राप्त इण्टर कालेज है। इस विद्यालय में कार्यरत शिक्षा एवं शिक्षणोत्तर कर्मचारियो पर माध्यमिक शिक्षा (संशोधित) अधिनियम 1921, वेतन वितरण अधिनियम-1971 तथा माध्यमिक सेवा आयोग/चयन बोर्ड नियमावली 1982 एवं 1968 पूरी तरफ प्रभावी है।
3. उपरोक्त इण्टर कालेज के प्रबन्धतंत्र ने तीन सहायक अध्यापकों की नियुक्ति के लिये एक विज्ञापन 6.10.93 को प्रकाशित करवाया गया था तथा 29.10.93 तक आवेदन पत्र आमंत्रित किये गए थे।
4. उपरोक्त प्रक्रिया के आधार पर उपरोक्त इण्टर कालेज के प्रबन्धतंत्र ने अपने प्रस्ताव दिनाँक 31.10.1993 द्वारा प्रार्थी व अन्य दो (श्री कामेश्वर प्रसाद पाण्डेय, श्री फूलचन्द्र व श्री दयानाथ पाण्डेय) का चयन किया और 31.10.1993 को इन तीनों को नियुक्ति पत्र भी निर्गत कर दिये । तीनों ने कार्यभार ग्रहण दिनाँक 1.11.1993 को कर लिया तथा प्रबन्धकतंत्र ने अपने पत्रांक प्रबन्धक मीमो 93-94 दिनांक 2.11.93 द्वारा नियुक्ति के अनुमोदन हेतु पत्राजात, जिला विद्यालय निरीक्षक, इलाहाबाद को प्रेषित किये गये।
5. उपरोक्त इण्टर कालेज के प्रबन्ध तंत्र द्वारा निर्गत अध्यापक सूची तालिका 1993 के अनुसार याची की नियुक्ति श्री शोभानाथ सं0अ0 के प्रवक्ता वेतन क्रम में दिनांक 21.10.91 से प्रवक्ता (अर्हत) में पदोन्नति के कारण हुए पद पर हुई होना दर्शाया गया है। यह तालिका याचिका के संलग्न सं. 2 के रुप में संग्लन को लगाई गई है। यह fjfDr तदर्थ (अल्प) दर्शायी गयी है।
6. याची को नियुक्ति के बाद वेतन व भुगतान न होने के कारण इस उच्च न्यायालय में वेतन भुगतान हेतु व्यवहार प्रकीर्ण आज्ञा पत्र याचिका संख्या 8001 वर्ष 1994 योजित की गयी। उक्त याचिका आदेश दिनांक 4.12.2003 के द्वारा निस्तारित की गई तथा जिला विद्यालय निरीक्षक, इलाहाबाद को निर्देशित किया गया कि प्रकरण में उभय पक्षों को सुनकर सकारण/ आख्यापक आदेश द्वारा यह निर्णित करे कि क्या याची की नियुक्ति नियमानुसार हुई है या नहीं? अगर नियुक्ति नियमानुसार है तो जिला विद्यालय निरीक्षक यह सुनिश्चित करे कि याची को वेतन मिल जाये।
7. याची ने उपरोक्त वर्णित आदेश के अनुपालन में एक प्रतिवेदन दिनांक 23.12.2003, जिला विद्यालय निरीक्षक इलाहाबाद के समक्ष पेश किया व 1.11.1993 से वेतन भुगतान का निवेदन किया।
8. जिला विद्यालय निरीक्षक, इलाहाबाद ने ऊभय पक्षों को सुनकर आख्यापक आदेश दिनांक 27.4.2006 द्वारा याची के प्रतिवेदन को अस्वीकार कर दिया और उल्लेख किया कि “समीक्षा के आधार पर पाया गया कि याची की नियुक्ति बिना नियमों के पालन किये हुए, मौलिक रिक्त पद पर प्रबन्धतंत्र को नियुक्ति करने का अधिकार नहीं था। अतः याची की नियुक्ति आमान्य कि जाती है।” इस आदेश के अनुसार प्रबन्धनतंत्र द्वारा मौलिक रिक्त पद के प्रति तदर्थ (अल्प) पद पर नियुक्ति के लिए जो विज्ञापन प्रकाशित किया उसमें निम्न त्रुटियां भी पाई गई।
1.विज्ञापन में कोई न्यूनतम शैक्षिक योग्यता अंकित नहीं की गयी थी।
2. विद्यालय द्वारा यह भी प्रस्तुत नहीं किया गया था कि कुल कितने आवेदन पत्र प्राप्त हुए इसमें कितने साक्षात्कार में उपस्थित हुए।
3. साक्षात्कार सूची नियमानुसार प्रस्तुत नहीं की गयी थी।
4. चयन सम्बन्धी कोई कार्यवाही नहीं की गयी थी।
5. चयन का क्या आधार लिया गया है यह भी स्पष्ट नहीं था।
6. मौलिक नियुक्तियों पर तत्समय रोक थी।
9. उपरोक्त वर्णित आदेश दिनाँक 27.4.2006 जो जिला विद्यालय निरीक्षक, इलाहाबाद द्वारा पारित किया गया था से क्षुब्द होने के कारण, प्रार्थी ने एक व्यवहार प्रकीर्ण आज्ञापत्र याचिका संख्या 45941 वर्ष 2006 इस उच्च न्यायालय में योजित की। उच्च न्यायालय की एकल पीठ ने आदेश दिनांक 15.5.2007 के माध्यम से आदेश दिनांक 27.4.2006 को अपास्त कर दिया तथा निर्णय दिया कि याची की नियुक्ति करने में वैधानिक प्रक्रिया का पूर्णतः पालन किया गया था। याची की नियुक्ति तदर्थ (अल्प) पद पर सर्वथा उचित थी। न्यायालय ने परमादेश जारी किया की जिला विद्यालय निरीक्षक याची द्वारा किये गये दिवस जिन पर उसने कार्य किया है उसके अनुसार याची को वेतन का 50% भुगतान करना सुनिश्चित करे तथा तत्पश्चात याची को पूर्ण वेतन देने के लिये उचित कदम उठाये।
10. जिला विद्यालय निरीक्षक, इलाहाबाद द्वारा उच्च न्यायालय के आदेश दिनांक 15.5.2007, के अनुपालन में आदेश पारित न करने की दशा में, याची ने अवमानना याचिका 3693/07 भी पेश की जिस पर दिनाँक 9.9.2009 को इस उच्च न्यायालय से जिला विद्यालय निरीक्षक को शीघ्र आदेश पारित करने का निर्देश दिया गया।
11. उपरोक्त उल्लेखित आदेश दिनांक 15.5.2007 व 9.9.2009 के अनुक्रम में, जिला विद्यालय निरीक्षक ने अपने आदेश दिनांक 12.10.2009 द्वारा निम्न निर्णय लियेः-
“1. माननीय उच्च न्यायालय के आदेश दिनांक 15.5.2007 के अनुपालन में याची की विद्यालय में उपस्थित स्टाफ रजिस्टर से प्रामाणित करने हेतु दिनांक 20.7.2007 में मेरे द्वारा स्थलीय निरीक्षण किया गया। उपस्थित पंजिका के अवलोकन से स्पष्ट हुआ कि याची श्री कामलेश्वर प्रसाद पाण्डेय के हस्ताक्षर विद्यालय की उपस्थिति पंजिका में दिनांक 10.5.2006 के बाद से नहीं है तथा उक्त विद्यालय में कार्यरत नहीं है। निरीक्षण के समय में भी याची विद्यालय से अनुपस्थित था। चूकि याची दिनांक 11.5.2006 से 15.5.2007 तक विद्यालय में कार्यरत नहीं रहे है और इस अवधि में याची की उपस्थित विद्यालय में प्रमाणित नहीं हो रही है। अतः 11.5.06 से 15.5.2007 तक एरियर में 50 प्रतिशत का भुगतान की देयता नहीं बनती है। अतः याची की यह मांग अस्वीकार किया जाता है।
2. याची के प्रत्यावेदन के बिन्दू के संबंध में स्पष्ट करना है कि प्रबन्धक द्वारा याची का ग्रामीण भत्ता रु0 225 माह नवम्बर 98 से मई 99 तक लगाया गया था जब कि इस अवधि में ग्रामीण भत्ता के रुप में रुप 40 प्रतिमाह देय था। जिसे निदेशालय स्तर पर जांच में सही कर दिया गया है। अतः 581254 रुपया के स्थान पर 580606 भुगतान होना सही पाया गया। इस बिन्दु पर याची को कोई देयता नहीं बनती है।
3. माननीय उच्च न्यायालय ने अपने आदेश दिनांक 15.5.2007 में याची के तत्काल नियमित वेतन भुगतान के आदेश दिए थे अतः याची के 16.05.2007 से 31.10.2007 तक के वेतन भुगतान की सहमति प्रदान की जाती है।
4. याची की नियुक्ति 1.11.93 से मानते हुए वेतन निर्धारण कराने एवं अवशेष देयक के भुगतान की सहमति प्रदान की जाती है।”
12. उक्त आदेश का अनुपालन किया गया तथा याची को वेतन दिया जाने लगा। परन्तु याची को यह शिकायत रही कि जब जिला विद्यालय निरीक्षक, इलाहाबाद ने यह मान लिया था कि याची 1.11.1993 से काम कर रहा है तो इसके फलस्वरुप अन्य लाभ जैसे, ज्येष्ठता, चयन ग्रेड, पदोन्नति ग्रेड इत्यादि का लाभ भी याची को मिलना चाहिये। इसके लिए याची ने बहुत से प्रार्थना पत्र भी लिखे परन्तु जब कोई उत्तर नहीं मिला तो याची ने एक बार फिर न्याय के दरवाजे को खटखटाया और याचिका सं 4914 वर्ष 2016 इस उच्च न्यायालय में पेश की। इस न्यायालय के एकल पीठ ने आदेश दिनाँक 4.2.2016 के द्वारा उक्त याचिका को निस्तारित किया एवं जिला विद्यालय निरीक्षक, इलाहाबाद को निर्देशित किया कि वो अतिशीघ्र याची की पीड़ा पर सकारण उचित आदेश पारित करे।
13. उपरोक्त आदेश के अनुपालन में जिला विद्यालय निरीक्षक इलाहाबाद ने सकारण/आख्यापक आदेश दिनाँक 28.5.2016/30.5.2016 को पारित किया व निम्न उद्धृत निर्णय पारित किया ।
“श्री कामेश्वर प्रसाद पाण्डेय का विनियमितीकरण का प्रकारण संयुक्त शिक्षा निदेशक, इलाहाबाद मण्डल इलाहाबाद को प्रेषित करने की कार्यवाही की जाये तथा श्री पाण्डेय के विनियमित के सम्बन्ध में मण्डलीय समिति से निर्णय होने के पश्चात तदनुसार याची को नियमित कर्मचारियों की वरिष्ठता सूची में सम्मिलित करने, इनके नाम के सम्मुख अंकित तदर्थ शब्द हटाने, नियमानुसार चयन वेतनमान एवं प्रोन्नत वेतनमान देने तथा पेंशन, सामान्य भविष्य निधि में सम्मिलित किये जाने संबंधी कार्यवाही किये जाने का निर्णय लेते हुये याची का प्रत्यावेदन निस्तारित किया जाता है।”
अपने आदेश में जिला विद्यालय निरीक्षक ने निम्न कारणों का उल्लेख किया है।
“1. श्री पाण्डेय के तदर्थ नियुक्त के कारण इनको वरिष्ठता सूची में अंकित नहीं किया गया, विनियमितीकरण के पश्चात ही नियमिते कर्मचारियों के साथ वरिष्ठता सूची में सम्मिलित किया जा सकता है।
2. श्री कामेश्वर प्रसाद पाण्डेय की नियुक्ति तदर्थ सहायक अध्यापक के रुप में हुई है जिसका विनियमितीकरण नहोने के कारण तदर्थ शब्द नहीं हटाया जा सकता।
3. श्री कामेश्वर प्रसाद पाण्डेय की नियुक्ति तदर्थ सहायक अध्यापक के रुप में हुई है जिसका विनियमितीकरण नहोने के कारण चयन वेतनमान एवं प्रोन्नत वेतनमान का लाभ नहीं दिया जा सकता।
4. श्री कामेश्वर प्रसाद पाण्डेय की नियुक्ति तदर्थ सहायक अध्यापक के रुप में हुई है जिसका विनियमितीकरण न होने के कारण पेंशन एवं सामान्य भविष्य निधि योजना में सम्मिलिति नहीं किया जा सकता है।”
14. ऐसा प्रतीत होता है, कि याची ने इस उच्च न्यायालय के आदेश दिनाँक 4.2.2006 के अनुपालन न होने के कारण अवमानना प्रार्थनापत्र (सिविल) 432 वर्ष 2017 इस उच्च न्यायालय में पेश किया, जो 31.1.2017 को निस्तारित इस आदेश के साथ की गयी कि इस आदेश की प्रति मिलने के एक सप्ताह के भीतर जिला विद्यालय निरीक्षक, इलाहाबाद विधिवत् आदेश पारित करे।
15. उपरोक्त आदेशों के अनुपालन व अनुक्रम में 3 संसदीय मण्डलीय विनियमितिकरण समिति ने सभी परिस्थितियों के अनुशीलन के उपरान्त निम्नलिखित आदेश दिनांक 27.2.2017 पारित किया। जिसके अनुसार यह निर्धारित किया गया कि याची विनियमितिकरण की परिधि में नहीं आते है।
निर्णय
“मण्डलीय समिति द्वारा उपरोक्त स्थितियों के अनुशीलन के उपरान्त निर्णय लेती है कि-
1- श्री कामेश्वर प्रसाद पाण्डेय स0अ0 की नियुक्ति दिनांक 01.11.1993 को अल्पकालिक रिक्त पद पर की गई थी। श्री पाण्डेय को माननीय उच्च न्यायालय में योजित याचिका संख्या 45941/2006 में पारित अन्तिम निर्णय दिनांक 15.05.2007 के अनुपालन में दिनांक 01.11.1993 से 10.05.2006 तक का 50 प्रतिशत भुगतान किया गया है।
2- श्री कामेशवर प्रसाद पाण्डेय को दिनांक 11.05.2006 से 15.05.2007 की अवधि में विद्यालय में कार्यरत न रहने के कारण विभाग द्वारा वेतन भुगतान अस्वीकार कर दिया गया है जिससे स्पष्ट है कि कामेश्वर प्रसाद पाण्डेय संस्था में नियुक्त तिथि से निरन्तर कार्यरते नहीं रहे। शासनादेश संख्या 588/79-दि-1-16-1(क) 13-2016 दिनांक 22 मार्च 2016 से आच्दांदित न होने के कारण श्री कामेश्वर प्रसाद पाण्डेय विनियमितीकरण की परिधि में नहीं आते हैं।
एतद्द्वारा माननीय उच्च न्यायालय में योजित याचिका संख्या 4914/2016 एवं अवमानना याचिका संख्या 432/2017 में पारित निर्णय क्रमशः दिनांक 04.02.2016 एवं 31.01.2017 के अनुपालन प्रकरण निस्तारित किया जाता है। “
16. उपरोक्त निर्णय दिनाँक27.2.2017 से क्षुब्द्ध होने के कारण याची ने वर्तमान व्यावहार प्रकीर्ण आज्ञापत्र याचिका पेश की जिसके द्वारा निर्णय दिनाँक 27.2.2017 को अपास्त करने व याची को 10.11.1993 से विनियमित करने का आदेश पारित करने की प्रार्थना की गयी है।
17. प्रत्यार्थी सं0 2 व 3 (मण्डलीय विनियमितीकरण समिति व जिला विद्यालय निरीक्षक, इलाहाबाद) के ओर से प्रति उत्तर शपथ पत्र दाखिल किया गया है। याची की ओर इस प्रति उत्तर शपथ पत्र का कोई उत्तर देने से इंकार किया गया है। प्रत्यार्थी 4 व 5 (प्राइवेट प्रत्यार्थी) की ओर से श्री वी के ओझा अधिवक्ता पेश हो रहे थे परन्तु 29.11.2019 जब इस याचिका पर निर्णय सुरक्षित किया गया, उस दिन याची अधिवक्ता द्वारा उनको लिखित सूचना देने के उपरांत भी श्री वी के ओझा या कोई अधिवक्ता प्रत्यार्थी 4 व 5 की ओर से उपस्थित नहीं हुआ। अतः याची के अधिवक्ता एवं प्रत्याशी 2 व 3 के अधिवक्ता को विस्तार से सुनकर याचिका पर निर्णय सुरक्षित रखा गया।
18. राम कृष्णा, याची के विद्वान अधिवक्ता ने कथन किया किः-
क- याची को विद्यालय के प्रबंधक तंत्र ने जिला विद्यालय निरीक्षक के आदेश दिनांक 27.4.2006 (याची को 10.5.2006 को मिला) के कारण याची को अपने पद पर कार्य नहीं करने दिया गया, परन्तु उक्त आदेश को उच्च न्यायालय के आदेश दिनांक 15.5.2007 द्वारा अपास्त कर दिया गया था। याची द्वारा 10.5.2006 से 15.5.2007 तक काम न करने कारण केवल वो आदेश ही था, जो बाद में अपास्त भी हो गया, अतः याची को इस समय अंतराल में भी कार्यरत मानना चाहिये तथा याची को निरन्तरता का लाभ भी देना चाहिये।
ख- याची शासनादेश दिनांक 22.3.2016 से पूर्णतः आच्छादित है। उक्त शासनादेश के अनुसार विनियमित होने के लिए अध्यापक को 7.8.1993 से या उसके पश्चात् किन्तु 2.1.1999 के पश्चात् नियुक्त नहीं होना चाहिए है। याची 1.11.1993 को नियुक्त हुआ था अतः वो इस शर्त को पूर्णतः पूर्ण करता है। इस शासनादेश की अन्य शर्त है कि अध्यापक/य़ाची उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड (संशोधन) अधिनियम 2016 के प्रारम्भ की तिथि तक संस्था में निरन्तर कार्य करता हो। याची इस शर्त को भी पूर्ण करता है, क्यों कि 10.5.2006 से 15.5.2007 तक कार्य न करने का एकमात्र कारण, उच्च न्यायालय के आदेश दिनांक 15.5.2007 जिसके द्वारा आदेश दिनांक 27.4.2006 (जो याची को 10.5.2006को मिला) अपास्त करने के कारण प्रत्याहार हो गया तथा फलस्वरुप याची को 10.5.2006 से 15.5.2007 तक भी सेवारत मानना चाहिये। उसके बाद याची निरंतर काम करता रहा।
ग- याची विनियमितिकरण के लिए आवश्यक सभी अर्हताओ को पूर्ण करता है, अतः उसकी सेवाओं को विनियमित करना चाहिये तथा इसके फलस्वरुप होने वाले सभी लाभों को याची को प्रदान करना चाहिये।
19. प्रतिउत्तर में उत्तर प्रदेश सरकार के स्थाई अधिवक्ता ने कथन किया कि यह निविवाद है कि याची 10.5.2006 से 15.5.2007 तक सेवारत नहीं रहा। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश दिनाँक 15.5.2007 (याचिका सं 4941 वर्ष 2006) में जिला विद्यालय निरीक्षक के आदेश दिनांक 27.4.2006 को अपास्त तो किया परन्तु 10.5.2006 से 15.5.2007 तक की याची की सेवा के विषय पर कोई टिप्पणी नहीं करी। अतः इस अंतराल में याची को सेवारत नहीं माना जा सकता। अतः याची के अपनी नियुक्ति से 22.3.2016 तक जब उ0प्र0 माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड (संशोधन) अधिनियम 2016 प्रारम्भ हुआ, तक निरन्तर कार्य नहीं किया है तथा निर्विवाद रुप से 10.5.2006 से 15.5.2007 तक याची सेवारत नहीं रहा, अतः उक्त अधिनियम द्वारा धारा 33 (छ) में दी गई शर्तो का पालन न करने के कारण याची विनियमितिकरण की परिधि के अंतर्गत नहीं आता है।
20. याची व प्रत्यार्थी के विद्वान अधिवक्ताओं को ध्यान पूर्वक सुना व याचिका पर उपबल्ध समस्त अभिलेखों का ध्यान पूर्वक परिशीलन किया।
21. इस प्रकरण में यह निरधारित किया जाना है कि याची विनियमितिकरण के लिये धारा 33 छ जो उ0प्र0 माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड (संशोधन) अधिनियम 2016 द्वारा ब़ढ़ा दी गई है, में वर्णित शर्तो को पूर्ण करता है कि नहीं। प्रस्तुत प्रकरण के संदर्भ के लिए ‘धारा 33छ’ निम्न उद्धृत की गई है।
“33-छ (1) प्रधानाचार्य या प्रधानाध्यापक से भिन्न ऐसे किसी अध्यापक को प्रबन्धक द्वारा मौलिक नियुक्ति दी जायेंगी जो,-
(क) समय -समय पर यथासंशोधित उत्तर प्रेदश माध्यमिक शिक्षा सेवा आयोग (कठिनाइयों को दूर करना) (द्वितीय) आदेश 1981 के पैरा-2 के अनुसार अल्पकालिक रिक्ति के सापेक्ष प्रवक्ता श्रेणी या प्रशिक्षित स्नातक श्रेणी में 07 अगस्त 1993 को या उसके पश्चात किन्तु 25 जनवरी, 1999 के पश्चात नहीं पदोन्नति द्वारा या सीधी भर्ती द्वारा नियुक्ति किया गया था और ऐसी रिक्ति को बाद में मौलिक रिक्ति में परिवर्तित कर दिया गया था, (अल्पकालिक रिक्तियों के सापेक्ष कतिपय और नियुक्तियों का विनियमितीकरण)
(ख) प्रवक्ता श्रेणी या प्रशिक्षित स्नातक श्रेणी में धारा 18 के अनुसार मौलिक रिक्त के सापेक्ष पदोन्नति द्वारा अथवा सीधी भर्ती द्वारा 07 अगस्त 1993 को या उसके पश्चात किन्तु 30 दिसम्बर 2000 के पश्चात नहीं तदर्थ आधार पर नियुक्त किया गया था,
(ग) इण्टरमीडिएट शिक्षा अधिनियम 1921 के उपबन्धों के अधीन चिन्हित अर्हताएं रखता हो या उनके अनुसार ऐसी अर्हताओं से छूट प्राप्त हो,
(घ) ऐसी नियुक्ति के दिनांक से उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड (संशोधन) अधिनियम, 2016 के प्रारम्भ होने के दिनांक तक संस्था में निरन्तर कार्य कर रहा हो,
(ङ) उक्त उपधारा के खण्ड (ख) के अधीन विहित प्रक्रियानुसार धारा 33-ग की उपधारा (2) के खण्ड (क) में निर्दिष्ट चयन समिति द्वारा मौलिक रुप से नियुक्ति के लिए उपयुक्त पाया गया हो।

(2) (क) मौलिक नियुक्ति के लिए अध्यापकों के नामों की संस्तुति उनकी नियुक्ति के दिनांक से यथा अवधारित ज्येष्ठता क्रम में की जायेगी,
(ख) यदि दो या अधिक ऐसे अध्यापक एक ही दिनांक को नियुक्त किये गये हो तो आयु में ज्येष्ठ अध्यापक की संस्तुति पहले की जायेगी।

(3) उपधारा (1) के अधीन मौलिक रुप से नियुक्ति प्रत्येक अध्यापक को ऐसी मौलिक नियुक्ति के दिनांक से परिवीक्षा पर समझा जायेगा।

(4) ऐसा अध्यापक, जो उपधारा (1) के अधीन उपयुक्त न पाया जाय और ऐसा अध्यापक जो उक्त उपधारा के अधीन मौलिक नियुक्ति पाने के लिए पात्र न हो, ऐसे दिनांक को, जैसा राज्य सरकार आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे, नियुक्ति पर नहीं रह जायेगा।

(5) इस धारा की किसी बात से यह नहीं समझा जायेगा कि कोई अध्यापक मौलिक नियुक्ति के लिए हकदार है, यदि उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड (संशोधन) अधिनियम 2016 के प्रारम्भ के दिनांक को ऐसी रिक्ति पहले से ही भरी हुयी थी या ऐसी रिक्ति के लिए चयन इस अधिनियम के अनुसार पहले से ही कर लिया गया है।

(6) तदर्थ अध्यापकों और अल्पकालिक रिक्ति के सापेक्ष नियुक्ति अध्यापकों की सेवा उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड (संशोधन) अधिनियम 2016 के प्रारम्भ होने के दिनांक से विनियमित की जायेगी।

(7) तदर्थ एवं अल्पकालिक रिक्तियों के सापेक्ष नियुक्त अध्यापकों के विनियमितीकरण में आरक्षण नियमों का पालन किया जाएगा।

(8) ऐसे तदर्थ शिक्षक जो उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा आयोग (कठिनाईयों) का निवारण आदेश 1981 के अनुसार या उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड अधिनियम, 1982 की धारा 18क के अनुसार नियुक्त नहीं किये गये हैं और अन्यथा जो केवल मा0 न्यायालय के अन्तरिम/आदेश के आधार पर वेतन प्राप्त कर रहे हैं, विनियमितीकरण के हकदार नहीं है। “
22. उपरोक्त वर्णित धारा 33 (छ) (1) (क) व (घ), स्पष्ट रुप से वर्णित करते है कि विनियमितिकरण के लिये अध्यापक की नियुक्ति 7.8.1993 से 25.3.1999 के मध्य होनी चाहिये व नियुक्ति की तिथि से 22.3.2016 (जब संशोधित अधिनियम 2016 प्रारम्भ हुआ) तक संस्था में निरन्तर कार्य करना चाहिए।
23. प्रस्तुत प्रकरण में याची की नियुक्ति 1.11.1993 को संस्था में हुई अर्थात उसकी नियुक्ति 7.8.1993 से 25.1.1999 में मध्य हुई। अन्य शर्त जैसे याची की नियुक्ति 1.11.1993 को अल्पकालिक रिक्त पद पर की गई थी तथा नियुक्ति प्रक्रिया को उच्च न्यायालय द्वारा भी उचित माना गया है को पूर्ण करता है। तथापि याची द्वारा उसकी नियुक्ति से संशोधित अधिनियम 2016 में प्रारम्भ होने की तिथि तक निरन्तर कार्य करने की शर्त पूर्ण नहीं करता है क्योंकि उसकी सेवा में 10.5.2006 से 15.5.2007 तक की सेवा की निरंतरता भंग हो गई थी अतः याची तथ्यात्मक रुप से सेवा की निरन्तरता की शर्त कॊ पूर्ण नहीं करता है। याची को विद्वान अधिवक्ता भी इस तथ्य को नकार नहीं पाये है।
23. एक बिन्दू और जो इस प्रकरण में ऊभर कर आता है कि क्या न्यायालय के द्वारा सेवा में आये अंतराल को निरंतर मानने के सम्बन्ध में निश्चित आदेश की अनुपस्थिति में भी इस अंतराल को भी सेवा के संदर्भ में निरंतर माना जा सकता है या नहीं।
24. न्यायालय द्वारा सेवा में पुनर्नियुक्ति का आदेश केवल पुनर्नियुक्ति का आदेश या पुनर्नियुक्ति के साथ सेवा की निरन्तरता का भी आदेश या पुनर्नियुक्ति के साथ सेवा की निरन्तरता व साथ ही साथ सेवा भी निरन्तरता के फलस्वरुप होने वाले सभी लाभॊ का भी आदेश हो सकता है। इन तीनों आदेशों में अंतर है। आदेश में प्रयोग किये गये शब्दो के अनुसार ही उस आदेश का लाभ दिया जा सकता है मात्र ‘पुनर्नियुक्ति’ के आदेश में ‘सेवा की निरन्तरता’ का आदेश स्वतः शामिल है यह नहीं माना जा सकता है।
25. वर्तमान प्रकरण में इस उच्च न्यायालय कि एकल पीठ ने अपने आदेश दिनांक 15.5.2007 के द्वारा जिला विद्यालय निरीक्षक के आदेश दिनांक 27.4.2006 को अपास्त (जो याची को 11.5.2006 को प्राप्त हुआ) तो कर दिया, परन्तु याची की इस अंतराल (11.5.2006 से 15.5.2007) की सेवा की निरन्तरता के विषय में कोई विशिष्ट आदेश नहीं पारित किया। अतः इस अंतराल में याची सेवारत रहा यह नहीं माना जा सकता। अतः याची धारा 33 (6) (1) (घ) में वर्णित ‘नियुक्ति से 22 मार्च 2006 तक सेवा की निरन्तरता’ की शर्त को पूर्ण नहीं करता है, क्योंकि निर्विवाद रुप से 11.5.2006 से 15.5.2007 तक याची संस्था में अध्यापक के रुप में सेवारत नहीं था।
26. उपरोक्त विवेचना से यह पूर्णतः विदित है कि याची विनियमितिकरण की सभी शर्तो को पूर्ण न करने के कारण विनियमितिकरण की परिधि में नहीं आता है। अतः मण्डलीय विनियमितिकरण समिति द्वारा पारित आछेपित आदेश दिनाँक 27.2.2017 में कोई तथ्यात्मक या वैधानिक त्रुटि नहीं है। अतः यह याचिका बलहीन होने के कारण निरस्त होने योग्य है अतः निरस्त की जाती है।
27. व्यय पर कोई आदेश पारित नहीं किया जा रहा है।

आदेश की तिथि :-10.01.2020
ए. देवल
[न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी]

 

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