Saturday, April 20, 2024
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धारा 28 में निर्दिष्ट आय संगणित करने में ऐसी कटौतियां

अन्य कटौतियां

36. (1) धारा 28 में निर्दिष्ट आय संगणित करने में ऐसी कटौतियां, जो निम्नलिखित खंडों में उपबंधित हैं, उनमें वर्णित मामलों की बाबत अनुज्ञात की जाएंगी—

(i) कारबार या वृत्ति के प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त स्टाक या स्टोरों के नुकसान या विनाश के जोखिम के विरुद्ध बीमे की बाबत दी गई किसी प्रीमियम की रकम;

(iक) किसी परिसंघ दुग्ध सहकारी सोसाइटी द्वारा सहकारी सोसाइटी के किसी सदस्य के स्वामित्वाधीन पशुओं के जीवन का बीमा कराने या उसे प्रवृत्त रखने की बाबत संदत्त प्रीमियम की रकम, जहां वह सहकारी सोसाइटी अपने सदस्यों द्वारा उत्पादित दूध का प्रदाय उस परिसंघ दुग्ध सहकारी सोसाइटी को करने में लगी हुई प्राथमिक सोसाइटी है;

(iख) निर्धारिती द्वारा नियोजक के रूप में,–

() साधारण बीमा कारबार (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972 (1972 का 57) की धारा 9 के अधीन बनाए गए भारतीय साधारण बीमा निगम और केंद्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित; अथवा

() किसी अन्य बीमाकर्ता द्वारा इस निमित्त बनाई गई और बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित,

किसी स्कीम के अधीन अपने कर्मचारियों के स्वास्थ्य का बीमा कराने या उसे प्रवृत्त रखने के लिए नकदी से भिन्न संदाय के किसी अन्य ढंग द्वारा दी गई किसी प्रीमियम की रकम;

(ii) की गई सेवाओं के लिए बोनस या कमीशन के रूप में किसी कर्मचारी को संदत्त कोई राशि, जहां ऐसी राशि उसको लाभ या लाभांश के रूप में संदेय न हुई होती यदि वह बोनस या कमीशन के रूप में संदत्त न की गई होती;

(iiक) [वित्त अधिनियम, 1999 द्वारा 1.4.2000 से लोप किया गया।]

(iii) कारबार या वृत्ति के प्रयोजनों के लिए उधार ली गई पूंजी की बाबत दिए गए ब्याज की रकम :

परंतु किसी आस्ति (चाहे लेखा बहियों में पूंजीगत हो या नहीं) के अर्जन के लिए उधार ली गई पूंजी की बाबत उस तारीख से, जिसको आस्ति के अर्जन के लिए पूंजी उधार ली गई थी, प्रारंभ होने वाली और उस तारीख तक की, जिसको ऐसी आस्ति पहली बार प्रयोग में लाई गई थी, किसी अवधि के लिए, संदत्त ब्याज की कोई रकम कटौती के रूप में अनुज्ञात नहीं की जाएगी।

स्पष्टीकरण.–पारस्परिक फायदा सोसाइटियों में, जो ऐसी शर्तें पूरी करती हैं जो विहित की जाएं, शेयरधारकों या अभिदायकर्ताओं द्वारा समय-समय पर दिए गए आवर्ती अभिदाय इस खंड के अर्थ में उधार ली गई पूंजी समझे जाएंगे;

(iiiक) किसी जीरो कूपन बंधपत्र पर, ऐसे बंधपत्र की ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, परिकलित अवधि को ध्यान में रखते हुए, छूट की अनुपातिक रकम।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए,–

(i) “छूट” से बंधपत्र जारी करने वाली अवसंरचनात्मक पूंजी कंपनी या अवसंरचनात्मक पूंजी निधि या पब्लिक सेक्टर कंपनी या अनुसूचित बैंक द्वारा प्राप्त की गई या प्राप्य रकम और ऐसे बंधपत्र की परिपक्वता या मोचन पर ऐसी कंपनी या निधि या पब्लिक सेक्टर कंपनी या अनुसूचित बैंक द्वारा संदेय रकम के बीच का अंतर अभिप्रेत है ;

(ii) “बंधपत्र की अवधि” से बंधपत्र के जारी किए जाने की तारीख से प्रारंभ होने वाली और ऐसे बंधपत्र की परिपक्वता या मोचन की तारीख को समाप्त होने वाली अवधि अभिप्रेत है ;

(iii) [***]

(iv) किसी मान्यताप्राप्त भविष्य निधि या किसी अनुमोदित अधिवार्षिकी निधि के लिए अभिदाय के तौर पर नियोजक के रूप में निर्धारिती द्वारा संदत्त कोई राशि, ऐसी परिसीमाओं के अधीन रहते हुए, जो यथास्थिति, भविष्य निधि को मान्यता देने या अधिवार्षिकी निधि को अनुमोदित करने के लिए विहित की जाए और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जैसी बोर्ड उन दशाओं में विनिर्दिष्ट करना ठीक समझे जिनमें अभिदाय नियत रकमों के वार्षिक अभिदायों के “वेतन” शीर्ष के अधीन प्रभार्य आय या अभिदायों या निधि के सदस्यों की संख्या के निर्देश में किसी निश्चित आधार पर नियत वार्षिक अभिदायों के प्रकार के नहीं है;

(ivक) निर्धारिती द्वारा नियोजक के रूप में किसी कर्मचारी के खाते में धारा 80गगघ में यथानिर्दिष्ट किसी पेंशन स्कीम के मद्दा अभिदाय के रूप में उस सीमा तक संदत्त कोई रकम जहां तक वह पूर्ववर्ष में कर्मचारी के वेतन के दस प्रतिशत से अधिक नहीं है।

स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, ”वेतन” के अंतर्गत, यदि नियोजन के निबंधनों में इस प्रकार उपबंधित हो, मंहगाई भत्ता भी है, किंतु इसके अंतर्गत सभी अन्य भत्ते और परिलब्धियां नहीं आती हैं;

(v) अप्रतिसंहरणीय न्यास के अधीन अपने कर्मचारियों के अनन्य फायदे के लिए अपने द्वारा सृष्ट किसी अनुमोदित उपदान निधि में अभिदाय के तौर पर नियोजक के रूप में निर्धारिती द्वारा संदत्त कोई राशि;

(vक) निर्धारिती द्वारा अपने किसी कर्मचारी से, जिसको धारा 2 के खंड (24) के उपखंड(x) के उपबंध लागू होते हैं, प्राप्त कोई राशि यदि ऐसी राशि निर्धारिती द्वारा निश्चित तारीख को या उसके पूर्व सुसंगत निधि या निधियों में कर्मचारी के खाते में जमा की जाती है।

34कक[स्पष्टीकरण]–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, ”निश्चित तारीख” से वह तारीख अभिप्रेत है जिस तक निर्धारिती से यह अपेक्षित है कि वह नियोजक के रूप में कर्मचारी के अभिदाय को किसी अधिनियम, नियम, आदेश या उसके अधीन या किसी स्थायी आदेश, अधिनिर्णय, सेवा संविदा के अधीन या अन्यथा निकाली गई अधिसूचना के अधीन कर्मचारी के सुसंगत निधि के खाते में जमा करे;

34कख[स्पष्टीकरण 2- शंकाओं को दूर करने के लिए, यह स्पष्ट किया जाता है कि धारा 43ख के उपबंध इस खंड के अधीन “नियत तारीख” का अवधारण करने के प्रयोजन के लिए लागू नहीं होते हैं और यह समझा जाएगा कि वे कभी भी लागू नहीं हुए थे]]

(vi) ऐसे जीव-जन्तुओं की बाबत जो व्यापार-स्टाक के रूप में प्रयुक्त किए जाने से अन्यथा कारबार या वृत्ति के प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किए गए हैं और मर गए हैं या ऐसे प्रयोजनों के लिए स्थायी रूप से बेकार हो गए हैं, निर्धारिती को जीव-जन्तुओं की वास्तविक लागत और जीव-जंतुओं के शवों की बाबत प्राप्त रकम का, यदि कोई हो, अंतर;

(vii) उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन किसी ऐसे डूबंत ऋण की रकम या उसका भाग जो पूर्ववर्ष के लिए निर्धारिती के लेखाओं में अवसूलीय रकम के रूप में बट्टे खाते डाल दिया गया है:

परन्तु ऐसे किसी निर्धारिती की दशा में जिसको खंड (viiक) लागू होता है ऐसे किसी ऋण या उसके भाग के संबंध में कटौती की रकम की सीमा वह रकम होगी जिससे ऐसा ऋण या उसका भाग उस खंड के अधीन डूबंत और शंकास्पद ऋणों के लिए की गई व्यवस्था लेखा में जमा अतिशेष से अधिक है।

परंतु यह और कि जहां ऐसे ऋण या उसके भाग की रकम को निर्धारिती की उस पूर्ववर्ष की, जिसमें ऐसे ऋण या उसके भाग की रकम अवसूलीय बन जाती है, या किसी पूर्ववर्ती पूर्ववर्ष की आय की संगणना करने में धारा 145 की उपधारा (2) के अधीन अधिसूचित आय संगणना और प्रकटन मानकों के आधार पर, उसे खाते में लेखबद्ध किए बिना, हिसाब में लिया गया है, वहां ऐसे ऋण या उसके भाग को उस पूर्ववर्ष में, जिसमें ऐसा ऋण या उसका भाग अवसूलीय बन जाता है, अनुज्ञात किया जाएगा और यह समझा जाएगा कि ऐसे ऋण या उसके भाग को इस खंड के प्रयोजनों के लिए खाते में अवसूलीय रूप में अपलिखित कर दिया गया है।

स्पष्टीकरण 1–इस खंड के प्रयोजनों के लिए निर्धारिती के लेखा में अवसूलनीय रूप में बट्टे खाते डाले गए डूबंत ऋण या उसके किसी भाग में निर्धारिती के लेखा में डूबंत और शंकास्पद ऋणों के लिये कोई व्यवस्था नहीं होगी;

स्पष्टीकरण 2–शंकाओं को दूर करने के लिए, यह स्पष्ट किया जाता है कि इस उपधारा के खंड (vii) के परंतुक और उपधारा (2) के खंड (v) के प्रयोजनों के लिए उसमें निर्दिष्ट लेखा, खंड (viiक) के अधीन डूबन्त और शंकास्पद ऋणों के उपबंध की बाबत केवल एक लेखा होगा और ऐसा लेखा सभी प्रकार के अग्रिमों, जिनके अंतर्गत ग्रामीण शाखाओं द्वारा दिए गए अग्रिम भी हैं, से संबंधित होगा;

(viiक) डूबंत और शंकास्पद ऋणों के लिए की गई व्यवस्था की बाबत—

() जहां ऐसी व्यवस्था किसी ऐसे अनुसूचित बैंक द्वारा की जाती है, जो भारत के बाहर किसी देश की विधि द्वारा या उसके अधीन निगमित बैंक नहीं है] या गैर-अनुसूचित बैंक या प्राथमिक कृषि प्रत्यय सोसाइटी से भिन्न किसी सहकारी बैंक या किसी प्राथमिक सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक द्वारा की जाती है, वहां कुल आय (इस खंड और अध्याय 6क के अधीन कटौती करने के पूर्व संगणित) के 35[साढ़े आठ प्रतिशत]से अनधिक रकम और ऐसे बैंक की ग्रामीण शाखाओं द्वारा दिए गए, विहित रीति से संगणित कुल औसत अग्रिम के दस प्रतिशत से अनधिक रकम :

परन्तु उस उपखंड में निर्दिष्ट अनुसूचित बैंक या गैर-अनुसूचित बैंक को, अपनी इच्छानुसार, किसी भी सुसंगत वर्ष में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा इस निमित्त जारी दिशानिर्देशों के अनुसार शंकास्पद आस्तियों या हानि की आस्तियों के रूप में उसके द्वारा वर्गीकृत किन्हीं आस्तियों के लिए उसके द्वारा की गई किसी व्यवस्था की बाबत उस रकम की कटौती अनुज्ञात होगी जो पूर्ववर्ष के अंतिम दिन बैंक की बहियों में दर्शित ऐसी आस्तियों की रकम के पांच प्रतिशत से अधिक न हो:

परन्तु यह और कि 1 अप्रैल, 2003 को या उसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले और 1 अप्रैल, 2005 से पूर्व समाप्त होने वाले सुसंगत निर्धारण वर्षों के लिए, पहले परन्तुक के उपबंध इस प्रकार प्रभावी होंगे मानो “पांच प्रतिशत” शब्दों के स्थान पर “दस प्रतिशत” शब्द रखे गए हों:

परंतु यह भी कि इस उपखंड में निर्दिष्ट किसी अनुसूचित ब®क या किसी गैर- अनुसूचित ब®क को, उसके विकल्प पर, केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाई गई किसी स्कीम के अनुसार प्रतिभूतियों के मोचन से प्राप्त आय से अनधिक रकम के लिए पूर्वगामी उपबंधों में विनिर्दिष्ट सीमाओं से अधिक की अतिरिक्त कटौती अनुज्ञात की जाएगी:

परंतु यह भी कि तीसरे परंतुक के अधीन कोई कटौती तब तक अनुज्ञात नहीं की जाएगी जब तक कि ऐसी आय “कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ” शीर्ष के अधीन आय की विवरणी में प्रकट न कर दी गई हो।

स्पष्टीकरण.–इस उपखंड के प्रयोजनों के लिए ”सुसंगत निर्धारण वर्षों” से 1 अप्रैल, 2000 को या उसके पश्चात् प्रांरभ होने वाले और 1 अप्रैल, 2005 से पूर्व समाप्त होने वाले पांच क्रमवर्ती निर्धारण वर्ष अभिप्रेत हैं;

() जहां ऐसी व्यवस्था किसी ऐसे बैंक द्वारा की जाती है, जो भारत के बाहर किसी देश की विधि द्वारा या उसके अधीन निगमित बैंक है वहां कुल आय के (इस खंड और अध्याय 6क के अधीन कटौती करने के पूर्व संगणित) पांच प्रतिशत से अनधिक रकम;

() जहां ऐसी व्यवस्था किसी लोक वित्तीय संस्था या राज्य वित्तीय निगम या राज्य औद्योगिक विनिधान निगम द्वारा की जाती है वहां कुल आय के (इस खंड और अध्याय 6क के अधीन कटौती करने के पूर्व संगणित) पांच प्रतिशत से अनधिक रकम:

परन्तु यह कि इस उपखंड में निर्दिष्ट कोई लोक वित्तीय संस्था या कोई राज्य वित्तीय निगम अथवा कोई राज्य औद्योगिक विनिधान निगम को उसके विकल्प पर 1 अप्रैल, 2003 को या उसके पश्चात् प्रारंभ होने वाले और 1 अप्रैल, 2005 से पूर्व समाप्त होने वाले दो क्रमवर्ती निर्धारण वर्षों में से किसी वर्ष के लिए, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा शंकास्पद आस्तियों या हानिप्रद आस्तियों के रूप में इस निमित्त जारी किए गए मार्गदर्शक सिद्धांतों के अनुसार वर्गीकृत किन्हीं आस्तियों के लिए इसके द्वारा बनाए गए किसी उपबंध की बाबत, पूर्ववर्ष के अंतिम दिन, यथास्थिति, ऐसी संस्था या निगम के खातों में दर्शित ऐसी आस्तियों की रकम के दस प्रतिशत से अनधिक रकम की कटौती अनुज्ञात की जाएगी।

() जहां कोई व्यवस्था, किसी गैर बैंककारी वित्तीय कंपनी द्वारा की जाती है, वहां (इस खंड और अध्याय 6क के अधीन कटौती करने से पूर्व संगणित) कुल आय के पांच प्रतिशत से अनधिक रकम।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए,—

(i) ”गैर-अनुसूचित बैंक” से बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खण्ड () में यथापरिभाषित ऐसी बैंककारी कम्पनी अभिप्रेत है जो अनुसूचित बैंक नहीं है;

(iक) ”ग्रामीण शाखा” से किसी अनुसूचित बैंक या गैर-अनुसूचित बैंक की ऐसी शाखा अभिप्रेत है जो ऐसे स्थान में स्थित है जिसकी जनसंख्या उस अंतिम पूर्ववर्ती जनगणना के अनुसार, जिसके सुसंगत आंकड़े पूर्ववर्ष के पहले दिन के पूर्व प्रकाशित हो गए हैं, दस हजार से अधिक नहीं है;

(ii) ”अनुसूचित बैंक” से भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का 23) के अधीन गठित भारतीय स्टेट बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) में परिभाषित समनुषंगी बैंक, बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 के अधीन या बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 के अधीन गठित तत्स्थानी नया बैंक, या कोई ऐसा अन्य बैंक अभिप्रेत है, जो भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की द्वितीय अनुसूची में सम्मिलित बैंक है ;

(iii) ”लोक वित्तीय संस्था” का वही अर्थ है जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 4क में है;

(iv) ”राज्य वित्तीय निगम” से अभिप्रेत है राज्य वित्तीय निगम अधिनियम, 1951 (1951 का 63) की धारा3 या धारा 3क के अधीन स्थापित कोई वित्तीय निगम या धारा 46 के अधीन अधिसूचित कोई संस्था;

(v) ”राज्य औद्योगिक विनिधान निगम” से अभिप्रेत है कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 के अर्थ में कोई सरकारी कम्पनी, जो औद्योगिक परियोजनाओं के लिए दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराने के कारबार में लगी हुई है और इस उपधारा के खंड (viii) के अधीन कटौती के लिए पात्र है;

(vi) “सहकारी बैंक”, “प्राथमिक कृषि प्रत्यय सोसाइटी” और “प्राथमिक सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक” के वही अर्थ हैं, जो धारा 80त की उपधारा (4) के स्पष्टीकरण में क्रमश: उनके हैं;

(vii) “गैर बैंककारी वित्तीय कंपनी” का वही अर्थ है, जो भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 45झ के खंड () में उसका है।

(viii) किसी विनिर्दिष्ट इकाई (एन्टीटी) द्वारा सृष्ट और बनाए रखे गए किसी विशेष रिजर्व के संबंध में ऐसी कोई रकम, जो ऐसे रिजर्व खाते में अग्रनीत, “कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ” शीर्ष के अधीन संगणित, पात्र कारबार से व्युत्पन्न लाभों के (इस खंड के अधीन कोई कटौती करने से पूर्व) बीस प्रतिशत से अधिक नहीं है :

परंतु यह कि जहां उन रकमों का योग, जो ऐसे रिजर्व खाते में समय-समय पर अग्रनीत की जाती रही हों, विनिर्दिष्ट इकाई की समादत्त शेयर पूंजी और साधारण रिजर्व की रकम से दो गुने से अधिक है, वहां ऐसे आधिक्य की बाबत इस खंड के अधीन कोई मोक नहीं दिया जाएगा।

स्पष्टीकरण-इस खंड में,-

() “विनिर्दिष्ट इकाई” से निम्नलिखित अभिप्रेत है,-

(i) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 4क में विनिर्दिष्ट कोई वित्तीय निगम ;

(ii) कोई वित्तीय निगम, जो पब्लिक सेक्टर कंपनी है ;

(iii) कोई बैंककारी कंपनी ;

(iv) प्राथमिक कृषि प्रत्यय सोसाइटी या किसी प्राथमिक सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक से भिन्न कोई सहकारी बैंक ;

(v) आवास वित्त कंपनी ; और

(vi) कोई अन्य वित्तीय निगम, जिसके अंतर्गत पब्लिक कंपनी भी है ;

(ख ) “पात्र कारबार” से निम्नलिखित अभिप्रेत है,-

(i) खंड (क) के उपखंड (i) या उपखंड (ii) या उपखंड (iii) या उपखंड (iv) में निर्दिष्ट इकाई की बाबत,–

(अ) औद्योगिक या कृषि विकास;

(आ) भारत में अवसंरचनात्मक सुविधा के विकास;

(इ) भारत में आवास के विकास,

के लिए दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराने का कारबार;

(ii) खंड () के उपखंड (v) में निर्दिष्ट विनिर्दिष्ट इकाई के संबंध में भारत में आवासीय प्रयोजनों के लिए गृहों के निर्माण या क्रय करने के लिए दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराने का कारबार; और

(iii) खंड () के उपखंड (vi) में निर्दिष्ट विनिर्दिष्ट इकाई के संबंध में भारत में अवसंरचनात्मक सुविधा के विकास के लिए दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराने का कारबार ;

() “बैंककारी कंपनी” से ऐसी कंपनी अभिप्रेत है, जिसे बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) लागू होता है और इसके अंतर्गत उस अधिनियम की धारा 51 में निर्दिष्ट कोई बैंक या बैंककारी संस्था भी है ;

() “सहकारी बैंक”, “प्राथमिक कृषि प्रत्यय सोसाइटी” और “प्राथमिक सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक” के वही अर्थ हैं जो धारा 80त की उपधारा (4) के स्पष्टीकरण में क्रमशः उनके हैं ;

() “आवास वित्त कंपनी” से ऐसी पब्लिक कंपनी अभिप्रेत है, जो भारत में आवासीय प्रयोजनों के लिए गृहों के निर्माण या क्रय करने के लिए दीर्घकालिक वित्त उपलब्ध कराने का कारबार करने के मुख्य उद्देश्य से भारत में बनाई गई है या रजिस्ट्रीकृत है ;

() “पब्लिक कंपनी” का वही अर्थ है जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 3 में है ;

() “अवसंरचनात्मक सुविधा” से अभिप्रेत है,-

(i) धारा 80झक की उपधारा (4) के खंड (i) के स्पष्टीकरण में यथापरिभााषित कोई अवसंरचनात्मक सुविधा या ऐसी ही प्रकृति की कोई अन्य लोक सुविधा, जो बोर्ड द्वारा इस निमित्त राजपत्र में अधिसूचित की जाए और जो उन शर्तों को पूरा करती हो, जो विहित की जाएं ;

(ii) धारा 80झक की उपधारा (4) के खंड (ii) या खंड (iii) या खंड (iv) या खंड (vi) में निर्दिष्ट कोई उपक्रम; और

(iiiधारा 80झख की उपधारा (10) में निर्दिष्ट कोई उपक्रम ;

() “दीर्घकालिक वित्त” से ऐसा कोई उधार या अग्रिम अभिप्रेत है, जहां कि उसके निबंधनों में, जिनके अधीन ऐसा धन उधार या अग्रिम दिया जाता है, पांच वर्ष से अन्यून की किसी अवधि के दौरान ब्याज सहित उसके प्रतिसंदाय के लिए उपबंध किया गया है ;

(viiiक) [* * *]

(ix) कोई ऐसा व्यय, जो किसी कंपनी द्वारा अपने कर्मचारियों में परिवार नियोजन को प्रोत्साहित करने के प्रयोजन के लिए सद्भावपूर्वक उपगत किया गया हो :

परन्तु यह कि जहां ऐसा व्यय या उसका कोई भाग पूंजीगत प्रकार का है, वहां ऐसे व्यय के पंचमांश की कटौती उस पूर्ववर्ष के लिए की जाएगी जिसमें वह उपगत किया गया था और उसके अतिशेष की कटौती ठीक उत्तरवर्ती चार पूर्ववर्षों में से हर एक वर्ष के लिए बराबर किस्तों में की जाएगी :

परन्तु यह और कि धारा 32 की उपधारा (2) और धारा 72 की उपधारा (2) के उपबंध इस खंड के अधीन अनुज्ञेय कटौतियों के संबंध में उसी प्रकार लागू होंगे जैसे वे अवक्षयण के संबंध में अनुज्ञेय कटौतियों के बारे में लागू होते हैं :

परन्तु यह और कि धारा 35 की उपधारा (2) के खंड (ii), (iii), (iv) और (v)और उपधारा (5) के, धारा 41 की उपधारा (3) के तथा धारा 43 के खंड (1) के स्पष्टीकरण 1 के उपबंध किसी ऐसी आस्ति के संबंध में, जो परिवार नियोजन को प्रोत्साहित करने के प्रयोजनों के लिए पूंजीगत प्रकार के व्यय के रूप की है, जहां तक संभव हो, उस प्रकार लागू होंगे जैसे उस आस्ति के संबंध में व्यय को लागू होते हैं जो वैज्ञानिक अनुसंधान पर पूंजीगत प्रकार की है;

(x) [* * *]

(xi) निर्धारिती द्वारा 1 अप्रैल, 1999 को या उसके पश्चात्, किंतु 1 अप्रैल, 2000 से पूर्व उपगत कोई व्यय, जो पूर्णत: और अनन्यत: निर्धारिती के स्वामित्वाधीन और कारबार या वृत्ति के प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त, गैर-Y2K कम्पलायंट कम्प्यूटर सिस्टम की बाबत किया गया हो, जिससे कि ऐसे कम्प्यूटर सिस्टम को Y2K कम्प्लायंट कम्प्यूटर सिस्टम बनाया जा सके :

परन्तु ऐसी कोई कटौती इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध के अधीन ऐसे व्यय की बाबत अनुज्ञात नहीं की जाएगी :

परन्तु यह और कि ऐसी कोई कटौती तब तक स्वीकार्य नहीं होगी जब तक कि निर्धारिती आय-कर विवरणी के साथ-साथ विहित फार्म में लेखापाल की रिपोर्ट न दे दे जैसा कि धारा 288 की उपधारा (2) के नीचे के स्पष्टीकरण में परिभाषित है, जिसमें यह प्रमाणित हो कि कटौती का इस खंड के उपबंधों के अनुसार सही दावा किया गया है।

स्पष्टीकरण.—इस खंड के प्रयोजनों के लिए,—

() ”कम्प्यूटर सिस्टम” से युक्ति या युक्ति संग्रह अभिप्रेत है जिसमें इनपुट और आउटपुट समर्थन युक्तियां भी शामिल हैं और केलकुलेटर शामिल नहीं हैं जिनका प्रोग्राम नहीं बनाया जा सकता और जो बाहरी फाइलों के योग में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता, या जिनमें से ज्यादातर में कम्प्यूटर प्रोग्राम, इलैक्ट्रानिक हिदायतें, इनपुट आंकड़े और आउटपुट आंकड़े होते हैं जो ऐसे कार्य करते हैं जिनमें तर्क, गणित, डाटा स्टोरेज और पुन: स्थापन, संचार और नियंत्रण भी शामिल हैं किंतु उन्हीं तक सीमित नहीं है;

() ”Y2K कम्प्लायंट कम्प्यूटर सिस्टम” से ऐसा कम्प्यूटर सिस्टम अभिप्रेत है जो बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दी के भीतर और उनके बीच अद्यतन आंकड़े ठीक से प्रोसेस, प्रोवाइड या ग्रहण कर सकता है;

(xii) ऐसे किसी निगम या निगमित निकाय द्वारा, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, उपगत कोई व्यय (जो पूंजीगत व्यय की प्रकृति का नहीं है), यदि,–

() उसे किसी केंद्रीय, राज्य या प्रान्तीय अधिनियम द्वारा गठित या स्थापित किया जाता है;

() ऐसा निगम या निगमित निकाय, जिसे उपखंड () में निर्दिष्ट अधिनियम के उद्देश्यों और प्रयोजनों को ध्यान में रखते हुए, केंद्रीय सरकार द्वारा इस खंड के प्रयोजनों के लिए राजपत्र में अधिसूचित किया जाता है; और

() वह व्यय उस अधिनियम द्वारा, जिसके अधीन वह गठित या स्थापित किया जाता है, प्राधिकृत उद्देश्यों और प्रयोजनों के लिए उपगत किया जाता है;

(xiii) बैंककारी नकद संव्यवहार कर की ऐसी कोई रकम जो निर्धारिती द्वारा पूर्ववर्ष के दौरान उसके द्वारा किए गए कराधेय बैंककारी संव्यवहारों पर संदत्त की गई है।

स्पष्टीकरण.–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, “बैंककारी नकद संव्यवहार कर” और “कराधेय बैंककारी संव्यवहार” पदों के वही अर्थ होंगे, जो वित्त अधिनियम, 2005 के अध्याय 7 में क्रमश: उनके हैं;

(xiv) किसी लोक वित्तीय संस्था द्वारा लघु उद्योगों के लिए ऐसे प्रत्यय (क्रेडिट) प्रत्याभूति निधि न्यास को, जो केंद्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए, अभिदाय के रूप में संदत्त कोई रकम।

स्पष्टीकरण–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, “लोक वित्तीय संस्था” का वही अर्थ है जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 4क में है;

(xv) निर्धारिती द्वारा पूर्ववर्ष के दौरान अपने कारबार के अनुक्रम में किए गए कराधेय प्रतिभूति संव्यवहारों की बाबत संदत्त प्रतिभूति संव्यवहार कर के बराबर रकम, यदि ऐसे कराधेय प्रतिभूति संव्यवहारों से होने वाली आय ”कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ” शीर्ष के अधीन संगणित आय में सम्मिलित की गई है।

स्पष्टीकरण – इस खंड के प्रयोजनों के लिए, ”प्रतिभूति संव्यवहार कर” और ”कराधेय प्रतिभूति संव्यवहार” पदों के वही अर्थ होंगे जो वित्त (सं. 2) अधिनियम, 2004 (2004 का 23) के अध्याय 7 के अधीन क्रमश: उनके हैं ।

(xvi) निर्धारिती द्वारा पूर्ववर्ष के दौरान अपने कारबार के दौरान किए गए कराधेय वस्तु संव्यवहारों के संबंध में संदत्त वस्तु संव्यवहार कर के बराबर रकम, यदि ऐसे कराधेय वस्तु संव्यवहारों से उद्भूत आय को “कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ” शीर्ष के अधीन संगणित आय में सम्मिलित किया जाता है।

स्पष्टीकरण–इस खंड के प्रयोजनों के लिए, “वस्तु संव्यवहार कर” और “कराधेय वस्तु संव्यवहार” पदों का वही अर्थ होगा जो वित्त अधिनियम, 2013 के अध्याय 7 में क्रमश: उनका है।

(xvii) चीनी के विनिर्माण के कारबार में लगी किसी सहकारी सोसाइटी द्वारा गन्ने का उस कीमत पर, जो सरकार द्वारा नियत या अनुमोदित रकम के बराबर या उससे कम है, क्रय करने के लिए उपगत व्यय की रकम।

36[(xviiiधारा 145 की उपधारा (2) के अधीन अधिसूचित आय संगणना और प्रकटन मानकों के अनुसार यथा संगणित चिàित बाजार हानि या कोई संभावित हानि।]

(2) किसी डूबंत ऋण या उसके किसी भाग के लिए कटौती करने में, निम्नलिखित उपबंध लागू होंगे—

(i) कोई भी ऐसी कटौती तब के सिवाय अनुज्ञात नहीं की जाएगी जब ऐसा ऋण या उसका कोई भाग निर्धारिती की ऐसे पूर्ववर्ष की, जिसमें ऐसा ऋण या उसका भाग अपलिखित कर दिया जाता है या किसी पूर्वतर पूर्ववर्ष की आय की संगणना करने में हिसाब में ले लिया गया है, अथवा बैंककारी या साहूकारी के ऐसे कारबार के मामूली अनुक्रम में, जो निर्धारिती द्वारा चलाया जाता है, उधार दिए गए धन के रूप में है;

(ii) यदि कोई रकम जो ऐसे किसी ऋण या ऋण के भाग की बाबत अंतत: वसूल की गई है, जब ऋण या उसके भाग और इस प्रकार की कटौती की गई रकम के अंतर से कम है, तो ऐसी कमी उस पूर्ववर्ष में कटौती योग्य होगी जिसमें वह अंतत: वसूली की जाती है;

(iii) ऐसी किसी ऋण या भाग की कटौती तब की जा सकेगी जब उसको किसी पूर्वतर पूर्ववर्ष (जो 1 अप्रैल, 1988 को प्रारम्भ होने वाले निर्धारण वर्ष या किसी पूर्वतर निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष है) के लेखाओं में अवसूलनीय रकम के रूप में पहले ही अपलिखित कर दिया गया है, किन्तु निर्धारण अधिकारी ने उसकी कटौती इस आधार पर अनुज्ञात नहीं की थी कि यह सिद्ध नहीं किया गया कि उस वर्ष में वह डूबंत ऋण हो गया था;

(iv) जहां ऐसा कोई ऋण या ऋण का भाग उस पूर्ववर्ष के (जो 1अप्रैल, 1988 को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष या किसी पूर्वतर निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष है) लेखाओं में अवसूलीय रकम के रूप में अपलिखित कर दिया जाता है और निर्धारण अधिकारी का समाधान हो जाता है कि ऐसा ऋण या उसका भाग किसी ऐसे पूर्वतर पूर्ववर्ष में डूबंत ऋण हो गया था जो उस पूर्ववर्ष से जिसमें ऐसा ऋण या उसका भाग अपलिखित कर दिया जाता है ठीक पहले के चार पूर्ववर्षों की कालावधि के बाहर नहीं पड़ता है, वहां धारा 155 की उपधारा (6) के उपबंध लागू होंगे;

(v) जहां ऐसा ऋण या उसका भाग ऐसे किसी निर्धारिती द्वारा, जिसको उपधारा(1) का खंड (viiक) लागू होता है, दिए गए अग्रिमों के संबंध में है वहां ऐसी कटौती तब तक अनुज्ञात नहीं की जाएगी जब तक कि निर्धारिती ने ऐसे ऋण या उसके भाग की रकम को पूर्ववर्ष में उस खंड के अधीन डूबंत और शंकास्पद ऋण लेखा के लिए की गई व्यवस्था में डेबिट न कर दिया हो।

34कक. वित अधिनियम, 2021 द्वारा 1.4.2021 से स्पष्टीकरण को स्पष्टीकरण 1 के रूप मे पुनः संख्यांकित किया गया।

34कख. वित अधिनियम, 2021 द्वारा 1.4.2021 से अंत:स्थापित।

35. वित्त अधिनियम, 2017 द्वारा 1.4.2018 से ”साढे सात प्रतिशत” शब्द प्रतिस्थापित।

36. वित्त अधिनियम, 2018 द्वारा भूतलक्षी प्रभाव से 1.4.2017 से अंत:स्थापित।

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